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Tuesday, August 16, 2011

2 comments:

रचना said...

slut वाल्क एक मार्च हैं इस सोच के खिलाफ की स्त्री अगर सर से पाँव तक ढकी नहीं रहती तो वो slut हैं ।
slut walk एक समाचार या एक क्रांति
समाचार था की टोरंटो कनाडा में एक पुलिस अधिकारी ने कहा था महिला को अगर सुरक्षित रहना हैं तो slut की तरह कपडे ना पहना करे । इस पर वहां की महिला ने आपत्ति दर्ज कराने के लिये वाल्क यानी मार्च किया जिसमे उन्होने हर तरीका कपड़ा पहना और कुछ बहुत ही कम कपड़ो में भी रही ।
इस के बाद ये मार्च / वाल्क कई और देशो में भी हुई और अब शायद ये दिल्ली में भी होगी ।
मीडिया ने इस पर लिखना शुरू कर दिया हैं क्युकी इंडिया में ऐसी वाल्क की कल्पना मात्र ही क्रांति हैं ।
मुद्दा क्या हैं इस slut वाल्क का । महज इतना की महिला कुछ पहने या ना पहने वो समाज में केवल इस लिये असुरक्षित हैं क्युकी वो महिला का शरीर ले कर पैदा हुई हैं ।
टोरंटो में या कहीं भी किसी भी देश में महिला कुछ भी पहने या न पहने , पुरुष की गन्दी दृष्टि और हरकतों ने उसका जीना मुश्किल कर दिया हैं । बड़े बड़े लोग !!!!! होटल के कमरे में नगन हो कर रहते हैं और रूम क्लीनर से बलात्कार की कोशिश करते । क्युकी बड़े हैं इस लिये उम्मीद करते हैं की रूम क्लीनर उनके इस कृत्य से गद गद हो जायेगी नहीं होती तो कहते हैं वो slut की तरह कपड़े पहन कर उनको लुभा रही थी ।
slut यानी एक ऐसी स्त्री जिसके अनेक पुरुषो से यौनिक सम्बन्ध हैं । एक तरफ आप के कानून कहते हैं की पत्नी से उसकी मर्जी के बिना स्थापित यौन सम्बन्ध भी बलात्कार हैं और वेश्या से भी सम्बन्ध उसकी मर्जी के बिना बनाना बलात्कार हैं, वही आप चाहते हैं की औरते सर से पाँव तक ढकी रहे ।
slut वाल्क एक मार्च हैं इस सोच के खिलाफ की स्त्री अगर सर से पाँव तक ढकी नहीं रहती तो वो slut हैं ।
अब इस मार्च / वाल्क को करने वाली लडकियां अपने मकसद को पाने के लिये किस तरह इस का आयोजन करती हैं ये देखना होगा ।

इस मार्च के विरोध में जितने हैं वो सब इस मार्च का मकसद समझे , लडकियां शरीर दिखाने या कम कपड़े पहने की मांग नहीं कर रही हैं । लडकियां एक सुरक्षित समाज की मांग कर रही हैं जहां वो जैसे सही और उचित लगे रह सके ।

संविधान और कानून हर देश में हैं और स्त्री - पुरुष के अधिकार हर देश के संविधान और कानून में { कुछ इस्लामिक देश छोड़ दे } बराबर हैं फिर अपने अधिकारों की लड़ाई इस सदी में भी नारियों को लड़नी पड़ रही हैं कभी इस विषय पर बात क्यूँ नहीं होती । क्यूँ हमेशा लड़कियों के सामायिक विद्रोह को { इस से पहले पिंक चड्ढी कैम्पेन के समय} उनकी असभ्यता समझी जाती हैं ।

हमारे अधिकारों का हनन होता हैं , हमे दोयम का दर्जा दिया जाता हैं , हमे slut वेश्या , नारीवादी , फेमिनिस्ट , प्रगतिशील इत्यादि तन्चो से नवाजा जाता हैं और अगर हम उसके विरोध में कुछ करते हैं तो भी हमे ही ये समझया जाता हैं विरोध कैसे करो ।

समस्या हमारी हैं क्युकी समाज आज भी हमको दोयम मानता हैं , तो विरोध भी हम ही करेगे और जैसे मन होगा वैसे करेगे । जितना जितना समाज हमको दबायेगा उतना उतना विरोध का स्वर मुखर होगा और हर विद्रोह का स्वर अगर संविधान और न्याय प्रणाली के भीतर हैं तो फिर उस पर आपत्ति करना व्यर्थ हैं

इस से पहले की ब्लॉग जगत में पोस्ट आनी शुरू हो और लड़कियों को असंस्कारी की उपाधि दी जाए मै अपने कर्त्तव्य की इती करते हुए इस वाल्क का मकसद आप के सामने रख रही हूँ सोच कर आपत्ति करे इस वाल्क पर । विरोध में साथ नहीं देना चाहते ना दे पर विरोध का विरोध बिना मकसद जाने और समझे ना करे


चलते चलते

अगर ये सब लडकियां जो slut वाल्क में जा कर विरोध कर रही हैं किसी बड़े मैदान में इकट्ठी होकर योग कर करके लेकिन उसी तरह जैसे बाबा लोग करते हैं यानी केवल एक वस्त्र में जहां शरीर का हर अंग दिखता हैं अपना विरोध करे और साथ में अनशन भी तो क्या भारतीये संस्कृति बच सकती हैं ।


बताये ताकि slut वाल्क के आयोजक जो अभी निर्णय नहीं ले पाए हैं की भारत में इसको किस प्रकार से किया जा सकता हैं कुछ सोच सके


meri post par aaye comments aap ko yahaan dikhaegae

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/slut-slut.html

Dr. Ayaz Ahmad said...

सलट वॉक की ज़रूरत इसलिए पड़ रही है क्योंकि पशुबल संपन्न आदमी जब औरत को अपना शिकार बना लेता है तो उसे इंसाफ़ के बजाय ज़िल्लत मिलती है। अगर मज़लूम औरत को इंसाफ़ मिल जाए और हैवान को सज़ा तो आज दुनिया में कहीं भी सलट वॉक निकालने की ज़रूरत ही न होती ।
...लेकिन यह दुनिया भी कैसी है कि ख़ुद तो सज़ा देना नहीं चाहते और जब कोई हैवान को सज़ा देने की कोशिश करता है तो उसकी आलोचना करते हैं।
इसी मौज़ू को लेकर हमने कुछ तहरीर किया है , इस पर आपकी राय चाहिए
आंख के बदले आंख का इंसाफ ??? ( एक रिपोर्ट जिसे सुना भी जा सकता है )