*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Friday, August 12, 2011

आखिर कब तक



यूँ मृतप्राय पड़े बस सोने से, क्रांति नहीं हुआ करती,
खुद पेट भर लेने से, राष्ट्र की भूख नहीं मिटा करती,
तेरे केवल जी लेने से, ये दुनिया नहीं जिया करती,
मत भूल बिन राष्ट्र तेरी भी, जिंदगी नहीं चला करती॥

कब तक बना रहेगा गर्दभ, अपनी अपनी किये रहेगा?
खुद का जीवन सुखमय, कब तक खुश ही बना रहेगा?
एड़ी छोटी घिस, स्वयं का भबिष्य बनाने की कोशिश,
करते करते यूँ ही तू, अब हल से कब तक जुता रहेगा?

मानव बन अब तो जाग, पहचान स्वयं को जीवित हो जा,
सोच समझ, कुछ कदम बढ़ा, कब तक भेडचाल चलेगा?
आज़ाद देश का पंछी है तू, ज्वालामुखी छिपाए अन्दर,
खुद को भूल, राष्ट्र पर यूँ ही, कब तक बोझिल बना रहेगा?

उतार जंग की परतों को अब, तलवारों में लगी हुयी,
तिलक लगा रक्त से अब,कब तक म्यान में ही रखेगा?
प्रारम्भ कर इन गद्दारों से, सफ़ेद रंग के सियारों से,
फिर बदल दे भारत का नक्शा भी, यूँ राष्ट्र तू बदलेगा॥

जाग अब तो जाग क्रांतिवीर, कब तक हल से जुता रहेगा?

2 comments:

vidhya said...

wow
बहुत सुन्दर लेख

Dr Varsha Singh said...

अंतस को झकझोरती हुई बेहतरीन रचना...