*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Tuesday, August 2, 2011

अच्छा किया दगा दी तूने





अच्छा किया दगा दी तूने,
इस जिन्दगी को सजा दी तूने,
अपनी कीमत भूल गया था,
मेरी औकात बता दी तूने॥

अच्छा किया दगा दी तूने,
मेरी हर चीज़ ठुकरा दी तूने,

3 comments:

LAXMI NARAYAN LAHARE said...

अच्छा किया दगा दी तूने,इस जिन्दगी को सजा दी तूने,अपनी कीमत भूल गया था,मेरी औकात बता दी तूने॥


खुबसूरत.....

prerna argal said...

इतनी निराशा क्यों /हर ब्यक्ति अपने में श्रेष्ठ है./किसी में कुछ गुण है किसी में कुछ /किसी की औकात किसी से कम नहीं है /सोच की बात है कुछ लोग अपने बारे में गलतफहमी के शिकार हो जातें हैं /अच्छी रचना /पर गुस्सा और निराशा से भरी हुई /

Neeraj Dwivedi said...

प्रेरणा जी .. हाँ इसमें गुस्सा जरुर है ... पर निराशा नहीं. और बहुत आभार आपका.