*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Tuesday, August 9, 2011

दास्ताने लालू

दास्ताने लालू
----------------
उनकी बकवास भी लोगों को भली लगती थी
उनकी  भैंसें भी  हरे नोट चरा  करती  थी
भीड़ रहती थी लगी,घर पर सदा भक्तों की
ये  तो है बात रंगीले,   सुनहरे वक्तों  की
बोलती रहती थी तूती बिहार में जिनकी
बड़ी बिगाड़ दी हालत है हार ने इनकी
नाव जो डूबी,संग छोड़ा साथ वालों ने
आया जो वक्त बुरा, छोड़ दिया सालों ने
अब तो तन्हाई में बस वक्त गुजारा करते
गए वो दिन जब मियां,फाख्ता मारा करते
खाते है बैठ के बीबी के संग लिट्टी,आलू
सबकी होती है यही नियति,है हम सब लालू




मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

No comments: