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Wednesday, August 3, 2011

स्वर्ण सुंदरी

स्वर्ण सुंदरी
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तुम मुस्काती
तो गालो पर,
ऐसी प्यारी रंगत आती
जैसे नोट हज़ार रूपये का,
प्यारा, सुन्दर
और सोने की गिन्नी जैसे,
डिम्पल पड़ते हैं गालों पर
चमक आँख की हीरे जैसी,
और दांत हो जैसे मोती
तेरे सुन्दर तन की आभा,
जैसे स्वर्णिम आभूषण सी
सजा रखे है,कलश स्वर्ण के,
तुमने तन पर
रूप राशी तुम,
तुम्हारी हर मुद्रा,
स्वर्णिम मुद्रा से बढ़
लाख टके सी प्यारी बातें,
तुम तो मूरत हो सोने की,
और खजाना हो  चाहत का
अपने दिल की बंद तिजोरी में,,
मेरा दिल,
छुपा रखा है जाने कबका
वणिक पुत्र मै,लोभी स्वर्ण और रत्नों का,
तुम्हारा अनमोल खजाना,
चाहूं रोज रोज ही पाना
स्वर्ण सुंदरी!

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

1 comment:

vidhya said...

बहुत सुन्दर
सुन्दर रचना