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Saturday, July 30, 2011

टूटो... नहीं हार से ........



जीवन में जीत  क्या , और हार क्या ?
जीत यदि पुरस्कार है 
तो हार, मन में उपजा एक अदम्य विश्वास है 
हार में ही निहित है जीत है
छिपा इसी में जीत का बीज 
हार में ही जीत की ललकार है 
जीत अगर परवाज है 
तो हार की भी तेज धार है 
पथरीली जमीन पर यह उगती घास है
माना की हार से हार जाता है मन 
पर यही तो बना देता है मन को कुंदन 
और जगाता मन में दृढ़ विश्वास है
तभी तो हार बन जाती है जीत की उड़ान 
और फिर मिलती है जीवन को
चिर प्रतीक्षित मुस्कान......



                                                                                                     नीलकमल वैष्णव "अनिश"

6 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी प्रस्तुति

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुंदर अभिवयक्ति....

Neeraj Dwivedi said...

बहुत अच्छी और प्रेरणादायक प्रस्तुति

वन्दना said...

वाह बेह्तरीन प्रस्तुति।

आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
http://tetalaa.blogspot.com/

Dorothy said...

बेहद सारगर्भित और खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

LAXMI NARAYAN LAHARE said...

माना की हार से हार जाता है मन पर यही तो बना देता है मन को कुंदन [Image]और जगाता मन में दृढ़ विश्वास हैतभी तो हार बन जाती है जीत की उड़ान और फिर मिलती है जीवन कोचिर प्रतीक्षित मुस्कान......

सुन्दर सार्थक अभिब्यक्ति ...
हार्दिक बधाई .....
आपका -मित्र
साहिल