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Thursday, July 28, 2011

अपनी रूह होती .






न मिलती गर जिंदगी हमें फारिग़  अपनी रूह होती,
न पशेमानी कुछ न करने की न रंजीदा अपनी रूह होती .

जिंदगी है इसलिए हमको मिलना  मिलकर बिछड़ना होता,
ये न होती तो न रगबत कोई न तहीदस्त अपनी रूह होती.

जिंदगी नाम फ़ना होने का न मय्यसर तुम्हे कुछ होगा,
न ज़बूँ तुमको ही मिल पाती न खुश्क अपनी रूह होती.


न होते मुबतला उजालों  में तुमको मेरे लिए मोहलत होती ,
तब न महदूद मेरी  उमरे-तवील तब न शाकी अपनी रूह होती.

न समझो शादमां मुझको न  मसर्रत हासिल ''शालिनी''को ,
बुझेगी शमा-ए-जिंदगी जिस रोज़ कर तफरीह अपनी रूह होती.

                                     शालिनी कौशिक 



शब्द-अर्थ:-फारिग़-किसी काम से मुक्त होना, रन्जीदा-ग़मगीन, पशेमानी-शर्मिंदगी , मुब्तला-घिरा हुआ रहना, उमरे-तवील-लम्बी उम्र ,रगबत-चाहत, मसर्रत-ख़ुशी ,शादमां-खुशहाल, तफरीह-घूमना फिरना,मौज-मस्ती करना,शाकी-शिकायत करने वाला,महदूद-हदबंदी ,तहीदस्त-खाली हाथ ,ज़बूँ-जिक्र-मिठास

3 comments:

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

शालिनी जी, मुझे आपकी रचना के ज्यादातर शब्दों का अर्थ समझ ही नही आया । माफ कीजियेगा, मेरी उर्दु थोड़ा कमजोर है ।
पोस्ट के अंत में सभी उर्दू के कठिन शब्दों का अर्थ भी रख देती तो मेरे जैसे अन्य लोगों को भी थोड़ी सुविधा हो जाती ।
धन्यवाद ।

vandana said...

न होते मुबतला उजालों में तुमको मेरे लिए मोहलत होती ,
तब न महदूद मेरी उमरे-तवील तब न शाकी अपनी रूह होती.
उम्दा गजल शब्दों के अर्थ देकर आपने इसके विस्तार को बाधा दिया

vidhya said...

बहुत सुन्दर है|