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Saturday, July 30, 2011

रिश्ते


जीवन सरल नहीं होता
हर कोई सफल नहीं होता
यदि किताबों से बाहर झाँका होता
अपने रिश्तों को आँका होता
कठिन घड़ी हो जाती पर
जीवन खुश हाल रहा होता |
पहले भी सब रहते थे
दुःख सुख भी होते रहते थे
इस समाज के नियम कड़े थे
फिर भी जीवन अधिक सफल थे |
सुख दुःख का साँझा होने से
कभी अवसाद नहीं होता था
जीवन जीना अधिक सहज था
पर आज जीना हुआ दूभर है
कभी सोचा कारण क्या है |
हम रिश्तों को भी न समझ पाए
केवल अपने में रहे खोये
संवेदनायें मरने लगीं
और अधिक अकेले होने लगे |
रिश्तों की डोर अधिक नाज़ुक है
अधिक खींच न सह पाती है
यदि समझ न पाए कोई
रिश्तों को बिखरा जाती है |
मन पीड़ा से भर उठता है
कोई छोर नजर नहीं आता
ग्रहण यदि लग जाये
घनघोर अँधेरा छा जाता है |
जिसने रिश्तों को समझा
गैरों को भी अपनाया
वही रहा सफल जीवन में
मिलनसार वह कहलाया |

आशा

7 comments:

LAXMI NARAYAN LAHARE said...

जीवन सरल नहीं होता
हर कोई सफल नहीं होता
यदि किताबों से बाहर झाँका होता
अपने रिश्तों को आँका होता
कठिन घड़ी हो जाती पर
जीवन खुश हाल रहा होता |

आदरणीया ,आशा जी साहित्याभिवादन ...
सुन्दर अभिब्यक्ति ....

आशा said...

आपकी टिप्पणी के लिए आभार |ऐसा ही स्नेह बनाए रखें |
आशा

Dr Varsha Singh said...

जिसने रिश्तों को समझा
गैरों को भी अपनाया
वही रहा सफल जीवन में
मिलनसार वह कहलाया |

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......

वन्दना said...

रिश्तों को बयाँ कर दिया………सुन्दर रचना।

आशा said...

वर्षा जी ,वन्दना जी
टिप्पणी करने के लिए आभार |ऐसा ही स्नेह बनाए रखें
आशा

Neeraj Dwivedi said...

Bahut sundar Asha ji .. Mujh jaise logo ko aap aise hi prerana aur seekh deti rahiyega .. bahut kuch seekhne ko milta hai.

आशा said...

नीरज जी आपकी टिप्पणी मेरे लिए भी बहुत अहम होती है |इसी प्रकार स्नेह बनाए रखें |
आशा