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Saturday, July 30, 2011

प्रतिमा....


कविता ...



आज सुबह-सुबह नींद खुली तो
हमने अपने छत से एक चाँद सा
सुन्दर सलोना मुखड़ा देखा
देखा, तो बस देखता ही रह गया
उसकी आँखों में न जाने क्या जादू था
जो हमें पत्थर कि मूर्ति
की तरह जड़ कर गई
जैसे ही उसने हल्की सी मुस्कुराई तो 
लगा जैसे पत्थर कि प्रतिमा में जान आ गई
उसने आँखों में ही किया अपने
इश्क-ए-मोहब्बत का इजहार
हमने भी उनके इस पैगाम को किया कबूल
क्योंकि हमें भी हो गया था उनसे प्यार
अब तो हर रोज ही उनकी राहों
में इंतज़ार करने लगे
हमारे मोहब्बत को देख-देख
सारी दुनियां वाले जलने लगे........


           नीलकमल वैष्णव "अनिश
www.neelkamalkosir.blogspot.com

2 comments:

vidhya said...

वाह बहुत ही सुन्दर
रचा है आप ने
क्या कहने ||

LAXMI NARAYAN LAHARE said...

हमें भी हो गया था उनसे प्यारअब तो हर रोज ही उनकी राहोंमें इंतज़ार

सुन्दर भाव ..... बहुत सुन्दर