*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

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Friday, July 10, 2020

प्रिय स्नेही जनो
सबसे पहले मैं स्वागत करता हूँ अग्रवाल परिवार का
जिनके साथ हमारे मधुर स्नेह बंधन बंधने जा रहे है
फिर बधाई है शिवांगी और अक्षय को जो परिणय सूत्र
की प्रथम सोपान पर आज चढ़ रहे है ,
कहते है
  समय के संग हमको चलना चाहिये
  रुख लचीला ,अपना रखना चाहिए
  जैसी भी हो सामने परिस्तिथिया ,
  मान्यता अपनी  बदलना  चाहिये
इन्ही पंक्तियों का अनुसरण करते हुए
आज का जो कार्यक्रम रखागया है वह
उत्तम सुधारवादी प्रयास है और इसके लिए
दोनों पक्षों को बधाई
आज के इस शुभ अवसर पर,
 एक छोटी सी कविता प्रस्तुत है

शिवांगी का आज रोका हो गया
अतुल ने कर दी मुनादी ज़ूम पर
सुनीता की  चाह  पूरी हो गयी ,
और खुश है दादा ,दादी ज़ूम पर
अनिल ने गाना सुनाया झूम कर ,
धूम बच्चों ने  मचा दी ज़ूम पर
हमने आशीर्वाद और शुभकामना
वर वधु को पहुँचादी  ज़ूम पर
यदि रही कोविद की पाबंदियां ,
तो सगाई ,होगी शादी ज़ूम पर
न तो डेस्टिनेशन ना इवेंट कुछ ,
एकदम सिम्पल और सादी ज़ूम पर
बैंड ना ,म्यूजिक का सिस्टम बजेगा ,
और होंगे सब बाराती ज़ूम पर
स्वामीजी उज्जैन से  मंतर पढ़ें ,
नॉएडा में होगी शादी ज़ूम पर
ख़ास थाली सबको हल्दीराम की
स्विगी से घर घर पहुंचादी घूम कर
दिखावे की होड़ सब थम जायेगी ,
बात ये अच्छी बनादी ज़ूम पर
बजट लाखों का था ऐसा होगा फिर  ,
सब फिजूल खर्ची बचा दी ज़ूम पर
काम बच्चों के उमर भर आएगी ,
ऍफ़ डी यदि जो बनादी ज़ूम पर

धन्यवाद और बधाइयाँ 

Wednesday, July 8, 2020

ज़ूम पर

ऐसी कोविद ने करी पाबंदियां ,
बच्चों की शादी करादी ज़ूम पर
न तो मैरिज हॉल ना इवेंट  था ,
एकदम सिम्पल और सादी ज़ूम पर
बेंड ना था,म्यूजिक का सिस्टम बजा,
और थे सारे बाराती ज़ूम पर
पंडितजी ने मंत्र अपने घर पढ़े ,
हमने सब रस्मे निभादी,ज़ूम पर
वर वधू ने सात फेरे ले लिए ,
और वरमाला पहनादी ज़ूम पर
ख़ास थाली ,सबको हल्दीराम की ,
स्विगी ने घर घर भिजादी घूम कर
आइफ़िल टावर के संग फोटो खिंचा ,
हनीमून सबको दिखादी  ज़ूम पर
दिखावे की होड़ सारी थम गयी ,
बात ये अच्छी  बना दी ,ज़ूम पर
बजट लाखों का था पर ऐसा हुआ ,
सब फिजूल खर्ची बचा दी ज़ूम पर
काम बच्चों के उमर भर आएगी ,
एफ डी  हमने बना दी झूम कर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

Tuesday, July 7, 2020

बीबी और ख़ुशी

कहने को तो कितना भला बुरा कहते है
इधर उधर भी नज़र मारते ही रहते है
लेकिन एक वो ही जो घास डालती तुमको ,
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

जैसी भी ,साथ तुम्हारा निभा रही है
तुम्हारा घर बार ,गृहस्थी चला रही है
बड़े प्यार से खाना तुमको पका खिलाती
तुम्हारे सुख दुःख की जो है सच्ची साथी
देती दूध ,गाय की लात ,सभी सहते है
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

एक वो ही जो वाकिफ तुम्हारी रग रग से
तुम्हारे खातिर  लड़ सकती, सारे जग से
जिसने माँ और बाप छोड़ कर तुमको पाया
तुमको परमेश्वर माना और प्यार लुटाया
वो ही पोंछती ,दुःख के आंसूं ,जब बहते है
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

साथ समय के जब ऐसे भी दिन आते है
 अपने वाले  ,सभी पराये हो जाते  है
रूप जवानी ,साथ उमर के ढल जाती है
काम बुढ़ापे में केवल बीबी आती है
सुख दुःख की बातें जिससे ,सुनते कहते है
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
जाने कहाँ गए वो दिन

याद आते है हमें वो दिन
जब जवानी के चमन में ,
मुस्कराती थी कलियाँ हसीन
हमेशा रहता था मौसम बहार का
हमारी भवरें सी नज़रें ,
टॉनिक पियां करती थी उनके दीदार का
लहराती जुल्फें ,हिरणी सी  नज़र
गुलाबी गाल,रसीले अधर
मोती सी दन्त लड़ी,कातिल मुस्कान
मीठी सी बोली जैसे कोयल का गान
याने पूरा का पूरा चन्द्रमुख दिखता था
प्यार जल्दी हो जाता देर तक टिकता था
पर अब इस कोरोना के खौफ ने ,
ऐसा सितम ढाया है    
हर हसीन चेहरे को मास्क में छुपाया है
किसी भी लड़की को देखो ,
बस दिखती है दो चमकती आँखें
और अपना बाकी चेहरा ,
रखती है वो मास्क में छुपाके
अब हम उन्हें कितना भी देखे घूर के
नजदीक से या दूर से
पता ही नहीं लगता उनका मुख कैसा है
उनके रुखसारों का रुख कैसा है
गुलाबी है या पीले है
कसे हुए है या ढीले है
 चिकने है या उनपर पिम्पल है
हँसते तो क्या गालों पर पड़ते डिम्पल है
सुंदरता के सब पैमाने
उनने छुपा रखें है अनजाने
पूरी की पूरी नाक ढकी रहती है
पता नहीं साफ़ है या बहती है
पतली है या मोटी  है
तिकोनी है या बोठी है
तोते सी है या समोसे सी है
पता ही नहीं लग पाता ,कैसी है
उनके 'अपर लिप्स 'पर बाल तो नहीं है
मर्दों जैसा हाल तो नहीं है
और चेहरे के सबसे मतवाले
सब से ज्यादा काम में आनेवाले
याने की उनके होठों का क्या हाल है
डार्क है या लाल है
मोटे  है या पतले है
सूखे है या रस से भरे है
चिकने है या उजाड़ है
छोटी है या लम्बी ,उनकी मुंहफाड़ है
और उनकी दंत लड़ी
मोती सी सफ़ेद है या पीली पड़ी
टेढ़े मेढे है या सीधे दिखलाते है
होठों के बाहर तो नहीं नज़र आते है
सबकुछ ढका रहने से खुल न पाता राज़
कैसा है उनकी मुस्कराहट का अंदाज
उनकी हंसी कातिल है कि नहीं
उनके होठों या गालों पर,तिल है कि नहीं
और उनकी ठोड़ी
तीखी है या  बैठी हुई है निगोड़ी  
गोया उनका पूरा मुखड़ा
लम्बा पतला है या गोल चाँद का टुकड़ा
और उनकी बोली मधुर है या भर्राई
मास्क के कारण ये बात समझ ना आई
बस फुसफुसाहट ही देती है सुनाई
समझ ही नहीं पाता ये दिमाग है
कोकिला सी मधुर है या काग है
तो जब चेहरे की सुंदरता का सब सामान
जब पूरा ही ढका रहता है श्रीमान
तो ये अंदाज लगाना भी मुश्किल हो जाता ,
कि सामनेवाली बूढी है या जवान
बस दो घूरती हुई आँखें
और हम क्या ताकें
हम देख ही नहीं पाते
उनके चेहरे का नूर
परी है या हूर
बदसूरत है या हसीन
प्रोढ़ा है या कमसिन
ऐसे में तो बस नैन लड़ सकते है
पर इश्क़ में कैसे आगे बढ़ सकते है
क्योकि जब तक ना हो पूरा दीदार
कैसे हो सकता है प्यार
फिर मॉल ,सिनेमा ,गार्डन और रेस्त्रारंट
सब पड़े है बंद
डेटिंग पर जाने का स्कोप नहीं है
दोनों के मुंह पर मास्क है ,
चुंबन की भी होप नहीं है
ऐसे हालातों में कैसे प्यार हो मुमकिन
और याद आते है वो पुराने दिन
जाने कहाँ गये वो दिन

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 

Sunday, July 5, 2020

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मौसम और स्वाद

सुबह सुबह क्यों तलब चाय पीने की मन में उठती है ,
ब्रेकफास्ट के समय जलेबी पोहे हमे सुहाते है
खाने बाद याद पापड़ की ,क्यों हमको आती अक्सर ,
सर्दी में ही गजक रेवड़ी ,मुंह का स्वाद बढ़ाते है
गर्मी के पड़ते ही कुल्फी ,आइसक्रीम लुभाते मन ,
बारिश पड़ते गरम पकोड़े ,याद हमें क्यों आते है
सर्दी में गाजर हलवे का स्वाद सुहाता है सबको ,
और सावन के महीने में ही ,घेवर मन को भाते है

बूंदी लड्डू ,बेसन चक्की ,सदाबहार मिठाई है ,
श्राद्ध पक्ष में सबसे ज्यादा खीर बनाई जाती है
सदाबहार समोसे होते ,गर्म गर्म और मनभावन,
खुशबू आलू की टिक्की की ,मुंह में पानी लाती है
दही बड़े और चाट पापड़ी ,हर मौसम में चलते है ,
पानी पूरी हमेशा ही सबके मन को ललचाती  है
ये जिव्हा है रस की लोभी ,बड़ी स्वाद की मारी है ,
मौसम के संग संग उसकी भी ,चाह बदलती जाती है

मदन मोहन बाहेती ;घोटू ' 

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Thursday, July 2, 2020

Fwd:



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From: madan mohan Baheti <baheti.mm@gmail.com>
Date: Wed, 10 Jun 2020 at 10:06 AM
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To: baheti.mm.t. <baheti.mm.tara1@blogger.com>, <baheti.mm.tara2@blogger.com>, <baheti.mm.tara4@blogger.com>, Ram Dhall <dhall.ram@gmail.com>, <kalampiyush@hotmail.com>, <kamal.hint@gmail.com>, navin singhi <navinsudha@gmail.com>, Rakesh Sinha <rakesh.sinha2407@gmail.com>, Ritu Baheti <ritubaheti@gmail.com>, Siddharth shanker jha <siddharthsjha@gmail.com>, Vanesa Míguez Agra <vmagra@gmail.com>, A.K. Khosla <ak19711@gmail.com>, Dr. Prakash Joshi <drjoship52@gmail.com>, Dwarka Baheti <dwarkabaheti1@gmail.com>, Jagdish Baheti <bahetijagdish1@gmail.com>, Sumit Bhartiya <skbH2000@gmail.com>, Vinita Lahoti <vinita.lahoti1@gmail.com>


पीने की चाहत

ना जरूरत है मधुशाला की ,ना जरूरत है मधुबाला की ,
ना जरूरत है पैमानों की ,प्याले भी सारे  रीते है
किसको फुरसत है ,मधुशाला जा  भरे पियाला और पिये ,
हम वो बेसबरे बंदे है , सीधे बोतल से पीते  है
ली दारू बोतल ठेके से ,गाडी में आये और खोली ,
आधी से ज्यादा बोतल तो  ,गाडी में निपटा देते है
लेते संग में नमकीन नहीं ,ना गरम पकोड़े आवश्यक ,
हम तो मादक मदिरा पीकर ,मस्ती का जीवन जीते है

है इतने दर्द जमाने में ,कि उन्हें भूलने के खातिर ,
जब हो जाते है परेशान ,ये काम कर लिया करते है
पानी की जगह बीयर पीते ,शरबत की जगह पियें वाइन ,
जैसा महफ़िल का रुख देखा ,हम जाम भर लिया करते है  
करने को कभी गलत ग़म को,या कभी मनाने को खुशियाँ ,
कोई न कोई बहाने से ,तर हलक़ कर लिया करते है
दुनिया के दिए हुये जख्मो ,को सीने से बेहतर पीना ,
ये दारू नहीं ,दवाई है ,पी जिसे  जी लिया  करते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
छेड़छाड़  

छेड़ने में लड़कियों को ,मज़ा जो  तुमको  है  आये
अगर तुम्हे वो डाट लगाए ,रहो ढीठ से तुम मुस्काये
इस चक्कर में अगर कभी जो ,तुमको पड़े मार भी खानी ,
तो उनके पापा के बदले ,उनके हाथों की ही खायें

घोटू 
शंशोपज

एक तरफ तुम ये कहते हो ,
प्रगति के पथ पर बढ़ना है
इसीलिये कंधे से कंधा
मिला काम हमको करना है
और दूसरी और कह रहे ,
हमें करोना से लड़ना है
इसके लिये हमें आपस में ,
दो गज की दूरी रखना है
शंशोपज में है इनमे से,
बात कौनसी को हम माने
दूरी रखें ,मिले ना कंधे ,
देश प्रेम के हम दीवाने

घोटू 
कभी तुम भी ----

                           कभी तुम भी छरहरी थी    
स्वर्ग से जैसे उतर कर ,आई हो ,ऐसी परी थी
                           कभी तुम भी छरहरी थी
बड़ा ही कमनीय ,कोमल और कंचन सा बदन था
मदमदाता ,मुस्कराता और महकता मृदुल मन था
बोलती थी मधुर स्वर में ,जैसे कोकिल गा  रही हो
चलती लगता ,सरसों की फूली फ़सल लहरा रही हो
हंसती थी तो फूलों का जैसे  कि  झरना झर रहा हो
गोरा आनन ,चाँद नभ में ,ज्यों किलोलें कर रहा हो
थे कटीले नयन ,हिरणी की तरह ,मन को लुभाते
बादलों की तरह कुंतल ,हवा में थे ,लहलहाते
थी लबालब प्यार से तुम ,भावनाओं से भरी थी
                            कभी तुम भी छरहरी थी
वक़्त के संग,आगया यदि थोड़ा सा बदलाव तुममे
ना रही ,पहले सी चंचल ,आ गया  ठहराव  तुममे
प्यार के आहार से यदि ,गयी कुछ काया विकस है
तोअसर ये है उमर का,बाकी तो सब ,जस का तस है
अभी भी तिरछी नज़र से जब ,देखती ,मन डोलता  है
अभी भी मन का पपीहा ,पीयू  पीयू  बोलता  है  
अभी भी छुवन तुम्हारी ,मन में है सिहरन जगाती
तब कली थी,फूल बनकर,और भी ज्यादा सुहाती
हो मधुर मिष्ठान सी अब ,पहले थोड़ी चरपरी थी
                               कभी तुम भी छरहरी थी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
पता नहीं कल ---

मन यदि कुछ करने को करता ,तो करने दो ,
पता न कल ,कुछ करने के हालात  ना रहे
आज कामनाएं जाग्रत है ,मचल रही है ,
पता नहीं कल ,ऐसी कोई  बात ना रहे

बीत गयी सो बीत गयी ,ना लौट सकेगी ,
और कल क्या क्या हो सकता है ,नहीं खबर है
सिर्फ आज है ,जिसमे तुम अपने मन माफिक ,
कुछ भी कर सकते हो ,तुममे चाह अगर है
आज वक़्त है ,उसका पूरा लाभ उठालो ,
पता नहीं कल ,समय तुम्हारे साथ ना रहे
मन यदि  कुछ करने को करत्ता तो करने दो ,
पता न कल ,कुछ करने के हालत ना रहे

यूं तो कहते सारा खेल ,लकीरों का है ,
लिखा  भाग्य  में जो होना ,वो ही है होना
अपने मन मरजी का यदि तुम कुछ कर लोगे ,
नहीं बाद में तुम्हे पड़े पछता कर रोना
मन में आज बसे  हैं सपने कुछ करने के ,
पता न कल ये जोश और जज्बात ना रहे
मन यदि कुछ करने को करता ,तो करने दो ,
पता न कल कुछ करने के हालात ना रहे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, July 1, 2020

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Regards
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ये प्यार बुढ़ापे वाला है

ना आग धधकती सीने में ,ना मन में जलती ज्वाला है
धुंधली आँखों के मिलने का ,होता अंदाज निराला है
यह हंसी तुम्हारे होठों की ,अब भी करती मतवाला है
मैं अब भी तेरा कान्हा हूँ ,और तू मेरी बृजबाला  है
हम मालामाल प्यार से है ,सुर ताल बुढ़ापे वाला है
संसार बुढ़ापे वाला है ,ये प्यार बुढ़ापे वाला है

ये प्रीत नहीं है अब तन की ,अब मन की प्रीत उमड़ती है
ज्यों ज्यों ये उमर बढ़ा करती ,परवान मोहब्बत चढ़ती है
ना हिचक,झिझक एक दूजे से ,मिट जाते है संकोच सभी
जब एक नजरिया हो जाता ,मिलते आपस के सोच सभी
इतने वर्षों तक एक साथ ,काफी कुछ देखा भाला  है
 दिलदार  बुढ़ापे वाला है ,ये प्यार बुढ़ापे वाला है

बच्चे अपने अपने घर पर ,खुशहाल और आनंदित है
हम जिम्मेदारी मुक्त हुए ,और जीवन हुआ व्यवस्थित है
मन का संचित सब प्यार ,उंढेला करते एक दूसरे पर
अब हम खुद के खातिर जीते ,अवलम्बित एक दूसरे पर
मुश्किल में एक दूसरे को ,हमने खुद ही सम्भाला है
ये  भार  बुढ़ापे वाला है ,ये प्यार बुढ़ापे वाला है

जो छाये रहे जवानी में ,उन उन्मादों की उमर  गयी
मैं  चाँद तोड़ कर ला दूंगा ,उन वादों की अब उमर गयी
अब मुझे पता है तुम क्या हो ,और तुम्हे पता है मैं क्या हूँ
तुम बहती गंगा प्यार भरी ,मैं भरा प्रीत से दरिया हूँ
उठता था ज्वार कभी जिसमे ,अब शांत पड़ा मतवाला है
अभिसार बुढ़ापे वाला है ,ये प्यार बुढ़ापे वाला है

देता है तन अब साथ नहीं ,बिमारी ने है घेर लिया
परवाह नहीं करता कोई ,सब अपनों ने मुंह फेर लिया
समझौता कर हालातों से ,हम खुश रहते ,मुस्काते है
बीती यादों के साये में ,हम अपना समय बिताते है
यह दौर कठिन जीवन का पर ,इसका आनंद निराला है
यह अब भी मधु का प्याला है ये प्यार बुढ़ापे वाला है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '


चीन पर नुक्ता:चीनी -चंद शेर

हमने चीनी की बना कर चाशनी ,
उनकी  मिठाई बनाई  प्यार से
बदले में बिमारी उनने हमको दी ,
'डाइबिटीज 'पा हुये बीमार से

चीनी मिट्टी बरतनों सी चमकती ,
चीन ने हमको दिखाई दोस्ती
ठेस से हल्की सी ,टूटी चूर हो ,
चीन ने ऐसी निभाई दोस्ती

चीन की जहरीली ड्रेगन संस्कृती ,
सांस में हर एक ,समाया है जहर
मूंछ उग पाती न नीचे नाक के ,
एक होती है इधर और एक उधर

चीन से चूनोचरा (वादविवाद )चलता रहा ,
चुनाचे (फलस्वरूप )चीनेपेशानी (माथे पर बल )हो गई
नुक्ता:चीनी देख अपनी इस तरह ,
चीन को भी परेशानी हो गयी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Tuesday, June 30, 2020

बुढ़ापे में आशिक़ी

एक दिन अचानक ,
मेरे मन में कुछ ऐसा ख्याल आया
 मैंने अपने कुछ बुजुर्ग दोस्तों को ,
अपने घर चाय पर बुलाया
नाश्ता कराया और थोड़ी देर गप्पें मारी
बातें की ,दुनिया भर की ,सारी
याद दिलाये जवानी के जलवे ,
और बुढ़ापे की पीड़ा
फिर उनकी दुखती रग टटोलते हुए पूछा ,
क्या अभी भी कभी कभी ,
काटता है  मोहब्बत का कीड़ा
जरा बतलाओ अपने मन की बात
अगर कोई जवान सुंदरी ,
आपके आगे रखे प्रेम प्रस्ताव ,
तो क्या होंगे आपके हालात
मेरा यह प्रश्न सुन मेरे कुछ मित्र तो ,
एक दम भौंचक्के से रह गए
कुछ घबराये ,कुछ शरमाये ,
कुछ भावना में बह गए
कुछ की हालत हो गयी ठगी की ठगी
और किसी की तो लार ही टपकने लगी
बोले क्यों फालतू में ललचाते हो
यूं ही मीठे मीठे सपने दिखाते हो
लड़की अगर सुन्दर है और जवान है यार
तो उसके पीछे तो नौजवानो की लगेगी कतार
वो क्यों हम जैसे किसी बूढ़े से करेगी प्यार
जो है साठ  के पार
हम बोले आपकी शंका वाजिब है ,
आप सही फरमाते है
पर कुछ औरतों को ,
नए सिख्खाड़ों की बनिस्बत ,
अनुभवी लोग ही सुहाते है
पका हुआ  पान
न खांसी ,न जुकाम
अब हेमामालिनी को ही देखलो ,
उसके लिए क्या लड़को की थी कमी
पर वो शादीशुदा धर्मेंद्र की दुल्हन बनी
श्रीदेवी जैसी सुंदरी और हूर
उसको भी भाये विवाहित बोंनी  कपूर
फ़िल्मी दुनिया में तो है ये ट्रेंड
सबको चाहिए  अनुभवी फ्रेंड
ये सब तो दुनिया में होता ही रहता है
अगर आपके साथ हो ,तो आप क्या करेंगे ,
आपका मन क्या कहता है
अच्छा आप ही बतलाओ गुप्ता जी ,
आप तो गुप्त ज्ञान में माहिर है
आपकी आशिकमिजाजी जगजाहिर है
बताएं ,ऐसे में आप क्या बोलेंगे
गुप्ताजी हिचकिचाये फिर,
 गहरी सांस लेकर बोले ,बोलेंगे क्या ,
हम तो बहती गंगा में हाथ धोलेंगे
उनकी बात सुन ,बाकी मित्रों में ,
कुछ का आत्मविश्वास जगा
उन्होंने हिचकिचाहट को दिया भगा
एक ने टोका
इस उम्र में किस्मतवालों को ही,
 मिलता है ऐसा मौका    
अगर लड़की जेन्युइन है और नहीं करेगी धोखा
तो फिर हम भी उसे क्यों तरसायेंगे
बादल बन के बरस जाएंगे
दूसरे ने कहा सच है यार
ऐसे मौके कहाँ मिलते है बार बार
यूंही  मन इधर उधर ताकता दौड़ता है
और जब चिड़िया खुद ही फंस रही है ,
तो ये सुनहरा मौका कौन छोड़ता है
तीसरे ने भी हाँ में हाँ मिलाई
बोले जब किस्मत ने ही है अप्सरा भिजवाई
तो हम क्यों करेंगे रुसवाई
झट से चट कर लेंगे दूध और मलाई
चौथे ने कहा यार बात तो है भली
मचा रही है मेरे दिल में खलबली
सूखती बगिया में जब खिली है कोई कली
और अपनी खुशबू फैला रही है
खुद भवरे को बुला रही है
तो हम क्या साले बेवकूफ है ,
जो यूं ही चुप बैठ जाएंगे
निश्चित ही उसके रसपान का आनंद उठायेंगे
पांचवां जो चुप था ,सहमा  सहमा बोला
यार ऐसे ऑफर मिलने पर ,
सबका मन करता है डोला
पर क्या आपने सोचा है ,
आप बूढ़े है और वो जवान है
वो आपके पास आयी है
तो उसके भी कुछ अरमान  है
वो दहकती हुई आग है ,
आप है बुझती हुई चिंगारी
निश्चित ही वो पड़ेगी आप पर भारी
वो जवानी वाला जोश कहाँ से लाएंगे
वो दहकती रहेगी और आप बुझ जाएंगे
एक अतृप्त औरत ,
क्या क्या गुल खिला सकती है
उर्वशी की तरह आपको ,
अर्जुन सा  निकम्मा बना सकती है
इसलिए जिसको जो भी करना है ,
सोच समझ कर करना चाहिये
और मुद्दे की बात ये है कि
हमें अपनी बीबी से डरना चाहिए
किसी ने दाना डाला ,
और आपने पका लिए पुलाव ख़याली
और भूल गए बड़ी तेज ,
नाक वाली होती है घरवाली
जो आप जैसे भी हो ,
आपके साथ निभा रही है
आपकी गृहस्थी चला रही है
अगर उसे खबर लग गयी तो
घर में आजायेगा भूचाल
कल्पना करलो ,कैसा होगा हाल
ये सब तो ललचानेवाली बातें है
जिन्हे सोच कर हम मन बहलाते है
वरना इस उम्र में भूल जाओ गर्म बिरयानी
हमें तो घर की दाल रोटी ही है खानी
पांचवे की बात सुन सबके उड़ गए होश
ख़त्म हो गया सारा जोश
सभी पर गम के बादल छागये
अभी तलक  जो उछल रहे थे ,
सब अपनी औकात पर आगये

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Monday, June 29, 2020

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हाथ की बात

अगर जो दोस्ती करनी ,मिलाना हाथ पड़ता है
दुश्मनी जो निभानी तो ,दिखाना हाथ पड़ता है
हाथ पर हाथ रख करके ,बैठने से न कुछ होता ,
काम करना है आवश्यक ,हिलाना हाथ पड़ता है

पकड़ कर हाथ लो फेरे ,जनम भर का बंधे बंधन
खुले हाथों करो खरचा  ,खतम  पैसे  तो हो निर्धन
मिलाकर हाथ ,सबके साथ ,चलने में बसी खुशियां ,
तुम्हारे हाथ में ये है ,जियो तुम किस तरह जीवन

तुम्हारे हाथ की रेखा , तुम्हारे भाग्य की रेखा
जब उठते हाथ,आशीर्वाद,मिल जाता है अपने का
जोड़ते हाथ है जब हम ,नमस्ते है ,स्वागत है ,
हिला कर हाथ ,लोगों को ,बिदा  करते हुए देखा

हुनर हाथों में होता है ,कलाकृतियां बना देते
जो हो हाथों में बाहुबल ,विजय श्री आपको देते
प्यार में बाहुबंधन भी ,इन्ही हाथों से बंधता है ,
सहारा हाथ ये देते और गिरतों को उठा लेते

हाथ देते है ,लेते है ,मचलते है ,फिसलते है
नहीं जब हाथ कुछ लगता ,लोग जल हाथ मलते है
किसी के हाथ में मेंहदी ,किसी के हाथ पीले है ,
खनकती हाथ में चूड़ी , अदा से जब वो चलते है  

फरक मानव पशु में ये ,मनुज के हाथ होते है
बजाते तालियां ,खुशियों में हरदम साथ होते है
कमा ले करोडो ,इंसान दुनिया छोड़ जब जाता ,
नहीं कुछ साथ ले  जाता ,बस खाली हाथ होते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '