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Friday, June 22, 2018

नेताजी से 

परेशानी बढ़ , गयी अब चौगुना है 
कर रहे हर शिकायत को अनसुना है 
वोट पाकर , नोट के बस फेर में हो ,
क्या इसी के वास्ते तुमको  चुना है 
दूध चट कर  हमें कह कर चाय है ,
पिलाते तुम सिर्फ  पानी  गुनगुना  है
मुंह हमारा बंद रहे इस वास्ते 
आश्वासन  देते  पकड़ा झुनझुना है 
रजाई की तपिश पाने के लिए ,
रुई जैसा आपने हमको धुना है 
चाह कर भी हम निकल पाते नहीं ,
इस तरह से जाल वादों का बुना है 
अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मार कर ,
मन हमारा ,बहुत जल जल कर भुना है 
ज्यादा उड़ने वाले अक्सर अर्श से ,
फर्श पर गिर जाते ,देखा और सुना है  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Sunday, June 17, 2018

मुझे याद रहेगी देर तलक 

वो तेरी सूरत  मुस्काती 
वो तेरी जुल्फें  लहराती 
वो चाल तेरी हिरण जैसी ,
वो तेरी कमरिया बल खाती 
       मुझे याद रहेगी  तेरी झलक 
     बड़ी देर तलक ,बड़ी दूर तलक 
वो महकाता चंदन सा बदन 
वो बहकाती चंचल चितवन 
तू रूप भरी ,रस की गागर ,
वो मचलाता तेरा यौवन 
       जो भी देखे वो जाए बहक 
       बड़ी देर तलक बड़ी दूर तलक 
मुस्कान तेरी वो मंद मंद 
रसभरे ओंठ ,गुलकंद कंद 
तेरी हर एक अदा कातिल ,
मेरे मन को आती पसंद ,
        मद भरे नयन ,अधखुले पलक 
        बड़ी देर तलक,बड़ी दूर तलक 
वो तेरे तन की दहक दहक 
वो तेरी खुशबू,महक महक 
खन खन करती वो तेरी हंसी,
वो तेरी बातें चहक चहक 
        तू जाम रूप का ,छलक छलक 
         बड़ी देर तलक ,बड़ी दूर तलक 
तू मूरत  संगेमरमर की 
तू अनुपम कृति है ईश्वर की 
जैसे धरती पर उतरी हो ,
तू कोई अप्सरा अंबर की 
       तू सबसे जुदा ,तू सबसे अलग 
        बड़ी देर तलक ,बड़ी दूर तलक 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 

बावन पत्ते 

हम और तुम और बावन पत्ते 

जब तुम पीसो ,तब मै काटूँ 
जब तुम काटो ,तब मैं बांटू 
चौके,पंजे ,अट्ठे,सत्ते 
हम और तुम और बावन पत्ते 

इक्के दुक्के कभी कभी हम 
तीन पांच करते आपस में 
तुम चौका, मैं छक्का मारूं,
बड़ा मज़ा आता है सच में 
ये क्या कम हम साथ साथ है 
और बिखरे, सात आठ नहीं है 
तुम मारो नहले पर दहला ,
फिर भी मन में गाँठ नहीं है 
तुम बेगम बन रहो ठाठ से ,
बादशाह मैं ,पर गुलाम हूँ 
तुम हो हुकुम ,ईंट मैं घर की ,
तुम चिड़िया मैं लालपान हूँ 
कभी जीतते,कभी हारते ,
हँसते हँसते  बावन हफ्ते 
हम और तुम और बावन पत्ते 

मदन मोहन बाहेती'घोटू '

पिताजी आप अच्छे थे 

संवारा आपने हमको ,सिखाया ठोकरे सहना 
सामना करने मुश्किल का,सदा तत्पर बने रहना 
अनुभव से हमें सींचा ,तभी तो हम पनप पाये 
जरासे जो अगर भटके ,सही तुम राह पर लाये 
मिलेगी एक दिन मंजिल ,बंधाया हौंसला हरदम 
बढे जाना,बढे जाना ,कभी थक के न जाना थम 
जहाँ सख्ती दिखानी हो,वहां सख्ती दिखाते थे 
कभी तुम प्यार से थपका ,सबक अच्छा सिखाते थे 
तुम्हारे रौब डर  से ही,सीख पाए हम अनुशासन 
हमें मालुम कितना तुम,प्यार करते थे मन ही मन 
सरल थे,सादगी थी ,विचारों के आप सच्चे थे 
तभी हम अच्छे बन पाए ,पिताजी आप अच्छे थे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, June 13, 2018

आजकल तो रह गए हम छाछ है 

जवानी के वो सुहाने दिन गए ,बुढ़ापे का हो गया आग़ाज़ है 
थे कभी फुलक्रीम वाले दूध हम,आजकल तो रह गए बस छाछ है 
जवानी में थोड़ी भी ऊष्मा मिली ,खूं हमारा था उछालें  मारता 
दूध जैसे उफनने लगते थे हम,बड़ा ही मस्ती भरा  संसार था 
मलाई बन हसीं गालों पर लगे ,होते थे टॉनिक सुहागरात के 
उन दिनों की बात ही कुछ और थी ,मुश्किलों से संभलते जज्बात थे 
दिल किया खट्टा किसी ने फट गए ,किसी ने जावन जो डाला ,जम गए 
खोया बन के खोया अपने रूप को ,मथा जो कोई ने मख्खन बन गए 
अब पिघलते झट से आइसक्रीम से ,हमसे यौवन हो गया नाराज है 
थे कभी फुलक्रीम वाले दूध हम ,आजकल तो रह गए बस छाछ है 
जवानी का सारा मख्खन खुट गया ,कुछ यहाँ कुछ वहां यूं ही बंट गया 
लुफ्त तो सबने ही जी भर कर लिया ,खजाना सब लुट यूं ही झटपट गया 
मलाई जो भी थी थोड़ी सी बची ,बुढ़ापे की बिल्ली ,आ चट कर गयी 
स्निग्धता अब भी बची है प्यार की ,दूध की ताक़त भले ही घट गयी 
अब तो खट्टी छाछ सी है जिंदगी ,मगर फिर भी ,स्वास्थवर्धक स्वाद है 
तुम बनाओ कढ़ी चाहे रायता ,अब  भी देती ,हृदय को आल्हाद है 
सुरों में अब भी मधुरता है वही ,भले ही अब ये पुराना  साज है 
थे कभी फुलक्रीम वाले दूध हम,आजकल तो रह गए बस छाछ है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तुम पीठ खुजाओ हमारी 

हम संग है एक दूजे के ,तो फिर कैसी लाचारी 
मैं पीठ खुजाऊँ तुम्हारी,तुम पीठ खुजाओ हमारी 
इस बढ़ती हुई उमर में ,जो आई शिथिलता तन में 
 बढ़ गयी प्रगाढ़ता उतनी  ,हम दोनों के  बंधन में 
हम रोज घूमने जाते ,हाथों में  हाथ  पकड़ कर 
मिलती जब धुंधली नज़रें ,बहता है प्यार उमड़ कर 
रह कर के व्यस्त हमेशा 
हम रहे कमाते  पैसा 
बस यूं ही उहापोह में  ,ये उमर बिता दी सारी 
मैं पीठ खुजाऊँ तुम्हारी,तुम पीठ खुजाओ हमारी 
है दर्द मेरे घुटनो में ,तुम इन पर बाम लगा दो 
नस चढ़ी पिंडलियों की है ,तुम थोड़ा सा सहला दो 
हमने झुकना ना सीखा ,जीवन भर  रहे तने हम 
अब रहा नहीं वो दमखम ,आया झुकने का मौसम 
नाखून बढे  पैरों के 
काटे हम एक दूजे के 
काम एक दूजे के आएं ,यूं हम तुम बारी बारी 
मैं पीठ खुजाऊँ तुम्हारी ,तुम पीठ खुजाओ हमारी 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
पुराने दिनों की यादें 

आते है याद वो दिन ,जब हम जवान थे 
कितने ही हुस्नवाले हम पे मेहरबान  थे 
हमारी शक्शियत का जलवा कमाल था
आती थी खिंची लड़कियां कुछ ऐसा हाल था 
लेकिन हम फंस के एक के चंगुल में रह गए 
शादी की ,अरमां दिल के आंसुओ में बह गए 
फंस करके गृहस्थी में, हवा सब निकल गयी 
चक्कर में कमाई के ,जवानी फिसल गयी
 होकर के रिटायर , हुए ,बूढ़े  जरूर  है 
चेहरे पे हमारे अभी भी ,बाकी नूर   है 
लेकिन हम हसीनो के  चहेते  नहीं  रहे 
आती है पास लड़कियां ,अंकल हमें कहे 
अब मामले में इश्क के ,कंगाल हो गए 
गोया पुराना ,बिका हुआ, माल हो गए 
एक बात दिल को हमारे,रह रह के सालती 
बुढ़ियायें भी तो हमको नहीं घास डालती 
हालांकि उनका भी तो है उजड़ा हुआ चमन 
मिल जाए जो आपस में तो कुछ गुल खिला दे हम 
लेकिन हमारी किस्मत ही कुछ रूठ गयी  है
हाथों से जवानी की पतंग ,छूट गयी  है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

मोहब्बत का मज़ा -बुढ़ापे में 

न उनमे जोर होता है ,न हम में जोर होता है 
बुढ़ापे में,मोहब्बत का ,मज़ा कुछ और होता है 

गया मौसम जवानी का,यूं ही हम मन को बहलाते 
कभी वो हमको सहलाते,कभी हम उनको सहलाते 
लिपटने और चिपटने का ,ये ऐसा दौर होता है 
बुढ़ापे में मोहब्बत का ,मज़ा कुछ और होता है   

टटोला करती है नज़रें ,जहां भी  हुस्न है  दिखता
करो कोशिश कितनी ही कहीं पर मन नहीं टिकता 
भटकता रहता दीवाना ,ये आदमखोर होता है 
बुढ़ापे में मोहब्बत का ,मज़ा कुछ और होता है 

फूलती सांस ,घुटनो में ,नहीं बचता कोई दम खम
मगर एक बूढ़े बंदर से ,गुलाटी मारा करते हम 
भूख, पर खा नहीं सकते ,हाथ में कौर होता है 
बुढ़ापे में मोहब्बत का ,मज़ा कुछ और होता है 

जिधर दिखती जवानी है ,निगाहें दौड़ जाती है 
कह के अंकल हसीनाएं ,मगर दिल तोड़ जाती है 
पकड़ में आ ही जाते हो ,जो मन में चोर होता है 
बुढ़ापे में मोहब्बत का ,मज़ा कुछ और होता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

 

Saturday, June 9, 2018

बुढ़ापे में आशिकी का चक्कर 

एक दिन ,
हमारे बुजुर्ग साथी का विवेक जागा 
तो वो उन्होंने अपने अंतर्मन के पट खोले 
और अपनी धर्मपत्नी से बोले 
तुम मुझसे इतना प्यार करती हो 
तुम मेरा इतना ख्याल रखती हो 
फिर भी मैं जब तब 
जवान महिलाओं की तरफ 
ललचाई नज़रों से ताकता हूँ 
जब भी  मौका मिलता है ,
उनके पीछे चोरी छुपे भागता हूँ 
मैं जानता हूँ ये गलत है पर मुझे सुहाता है 
क्या मेरी इन हरकतों पर ,
तुम्हे गुस्सा नहीं आता है 
पत्नी ने मुस्करा कर दिया जबाब 
इसमें बुरा मान कर,
 मैं क्यों अपना दिमाग करू खराब 
आप मेरे हाथ से फिसलो ,
ये आपकी औकात नहीं है 
मैंने कई कुत्तों को ,
चमचमाती कार के पीछे दौड़ते देखा है 
जब कि वो जानते है कि कार ड्राइव करना ,
उनके बस की बात नहीं है 
तुम लाख लड़कियों के पीछे दौड़ो ,
वो डालनेवाली तुम्हे घास नहीं है 
और अगर बदकिस्मती से उसे पटालोगे 
तो मैं तो तुमसे सम्भल नहीं पाती  ,
उसको क्या संभालोगे ?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
अम्मा गयी विदेश 

निमंत्रण उसको मिला विशेष 
हमारी अम्मा  गयी  विदेश 
देख वहां की मेहरारू को ,अम्मा है शरमाती 
ऊंचा सा स्कर्ट पहन कर ,मेम चले इतराती 
ना सर चुन्नी,नहीं दुपट्टा ,खुली खुली सी छाती 
मरद से काटे छोटे केश 
हमारी अम्मा गयी विदेश 
खान पान भाषा से उसकी नहीं बैठती पटरी 
जाय घूमने,भूख लगे तो ,अम्मा खोले  गठरी 
ना पीज़ा बर्गर वो  खाये  अपने  लड्डू ,मठरी
यही है उसका भोज विशेष 
हमारी अम्मा गयी विदेश 
पोती और जमाई घूमे ,दिन भर पहने नेकर 
चकला बेलन नहीं ,बनाता रोटी,'रोटी मेकर '
एक दिन सब्जीदाल बनाकर खाते है हफ्तेभर
रसोई का ना निश दिन क्लेश 
हमारी अम्मा गयी विदेश 
जगह जगह पर छोरा छोरी और विदेशी जोड़े 
लाज शरम  तज,चूमाचाटी करते  दिखे निगोड़े 
होय लाज  से पानी अम्मा, मुंह पर घूँघट ओढ़े 
मुओं को शरम बची ना शेष 
हमारी अम्मा गयी विदेशी 
यूं तो सुथरा साफ़ बहुत ये देश है अंग्रेजों का 
महरी नहीं,मशीने करती ,बर्तन ,झाड़ू ,पोंछा 
टॉयलेट में नल ना ,कागज से पोंछो,ये लोचा 
लगे है दिल पर कितनी ठेस 
हमारी अम्मा गयी विदेश 
नहीं समोसे,नही जलेबी ,नहीं चाट के ठेले 
सब इंग्लिश में गिटपिट करते,घूम न सके अकेले 
डॉलर की कीमत रूपये में बदलो,रोज झमेले 
यहाँ का बड़ा अलग परिवेश 
हमारी अम्मा गयी विदेश 
पोती ने जिद कर अम्मा को नयी जींस पहना दी 
एक सुन्दर सा टॉप साथ में एक जर्सी भी ला दी 
मेम बनी अम्मा ,शीशे में देख स्वयं  शरमाती 
पहन कर अंग्रेजों का भेष     
हमारी अम्मा गयी विदेश 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
हम भी अगर बच्चे होते 

कहावत है 
बच्चे और बूढ़े ,होते है एक रंग 
जिद पर आजाते है ,
तो करते है बहुत तंग 
दोनों के मुंह में दांत नहीं होते 
स्वावलम्बी बनने के हालत नहीं होते 
किसी का सहारा लेकर चलते है 
बात बात पर मचलते है 
और जाने क्या सोच कर ,
कभी मुस्कराते है,कभी हँसते है 
वैसे ये भी आपने देखा होगा ,
कि सूर्योदय और सूर्यास्त  की छवि ,
एक जैसी दिखती है 
पर सूर्योदय के बाद जिंदगी खिलती है 
और सूर्यास्त के बाद जिंदगी ढलती है 
दोनों सा एक जैसा बतलाना हमारी गलती है 
'फ्रेश अराइवल ' के माल को ,
'एन्ड ऑफ़ सीजन 'के सेल वाले माल से ,
कम्पेयर करना कितना गलत है 
आपका क्या मत है ?
छोटे बच्चों को ,सुंदर महिलाएं 
रुक रुक कर प्यार करती  है 
कभी गालों को सहला कर दुलार करती है 
कभी सीने से चिपका लेती है 
कभी गोदी में बैठा लेती है 
कभी अपने नाजुक होठों से ,
चुंबन की झड़ी लगा देती है 
क्या आपने कभी ऐसा,
 किसी बूढ़े के साथ होते हुए देखा है 
नहीं ना ,भाई साहब ,
ये तो किस्मत का लेखा है 
बूढ़े तो ऐसे मौके के लिए ,
तरस तरस जाते है 
अधूरी हसरत लिए ,
दिल को तड़फाते है 
कोई भी  कोमलंगिनी 
उनके झुर्राये गालों को नहीं सहलाती 
चुंबन से या सीने से चिपका ,
मन नहीं बहलाती 
न कभी कोई बाहों में लेती है 
उल्टा 'बाबा' कह कर के दिल जला देती है 
बेचारे बूढ़े ,आँखों में प्यास लिए ,
मन ही मन है रोते
यही सोच कर की , 
हम भी अगर बच्चे होते 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

Tuesday, May 8, 2018

*विस्मृत धर्म विचलित कर्म*  (भाग 1)
                    [ साधक :राजशिवम् ]

मिले उम्र भी सहस्त्र इस संसार में,
अगर संस्कार न मिले तो
क्या वो मिलेंगे यहाँ के बाजार में ।
हमारी चिंतन को सत्य असत्य के मझधार से कोई क्या बचा लेगा ? अगर हम स्वयं ही न चाहें तो  भगवान भी हमें नहीं समझा सकता । दुर्योधन को समझाया क्या हुआ ? रावण को समझाया फिर भी युद्ध हुआ । आखिर मृत्यु सत्य है तो पहले इंसान बनने का मन क्यूं न हुआ ?
जीवन के 60 से 70 वर्ष में कितने सारे कर्म करने पड़ते हैं, कुछ तो बचपन में कुछ बुढ़ापे में लेकिन समझ में नहीं आता कि क्यों ? जो भी हम करते है कुछ प्रारब्ध के कारण कुछ संस्कार और माहौल के वशीभूत होकर पर जीवन का रहस्य समझ में नहीं आ पाता जो आना चाहिए। इस जीवन में मैंने अनुभव किया कि समाज के लोगों में अहंकार की प्रबलता फैली हुई है, मान सम्मान में छोटा कद वाला हो या बड़ा कद वाला , बेरोजगार हो या उच्च पद वाला या धनाढ्य सबमें अहंकार अति प्रबल है । इस प्रबलता का फैलाव चहुँ ओर तो नहीं कहूंगा , कारण अति सरल, विन्रम, दयालु, परोपकारी भी मौजूद है तभी तो इस पृथ्वी पर सुगंध से जन मानस आनन्दित होते हैं ।
ये कलि है यहाँ ईश्वर ही सतपथ पर ले जाएंगे लेकिन मन कहता है , ये पथ नीरस और उबाऊ है फिर भी जो इस पर मन को अर्पण कर देते हैं उनको ऐसा आनन्द प्राप्त होता है कि उस आनन्द से जीव शांत और मुक्त हो जाता है । आज सृष्टि में वही योग बन रहें है जो महाभारत के पहले बने थे । भोग लिप्सा में लोग इतने रत हैं कि मानवता कराह उठी है । जातिवाद, पंथवाद के अहंकार में कई भस्मासुर पैदा हो गए हैं । बड़े बड़े पद पर बैठे ये अपने पुण्यों के कारण , सतपथ को त्यागा केवल अपने अहं की एकमात्र पूर्ति के कारण । इससे क्या प्राप्त होगा ?
ज्ञानी का चित्त ध्वनित रहता है कि मैं सबकुछ जान लिया, धनिक का चित्त प्रतिध्वनित रहता है कि मैं जो चाहूं सो कर सकता हूं।
इंसान में जो भी गुण - अवगुण हो पर अगर वो स्वयं के जीवन में ईमानदार है तो ऐसे लोगों को आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति होती है जिससे जीवन और उसके रहस्य को समझ सकें ।
वह अमावस की रात वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर शिव-शक्ति की साधना चल रही थी । पिछले अमावस से आज एक माह की क्रिया से आज मन में कई प्रश्न लिए जल आहुति दे रहा था कि भारी गर्जना से एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुए !
मैंने प्रणाम किया, उनके मुकुट में सात दीप्तिमान प्रकाश हर दिशा को प्रकाशित कर रहा था । उनके उस रूप को देख शरीर में एक बार झुरझुरी सा भय व्याप्त हुआ मै शीघ्र अपने आत्मबल को आज्ञा चक्र में स्थित किया और कह उठा की हे देव आप कौन हैं ? वे बोल उठे वत्स मैं कौन हूँ ये जानना जरूरी नहीं है पर आपके मानस में जो सवाल हैं वे पूछ ले
आज आपके सारे सवाल का उत्तर दे ही दूंगा । उनकी बात सुन मेरे मन प्रफुल्लित होने लगा और मैंने पूछा कि हे देव, मनुष्य शरीर का उद्देश्य क्या है ? इसका उपयोग और प्रारब्ध क्या है ? एवं इसकी अंतिम गति क्या है ?
मेरी बात सुन देव मुस्कुराये , बोल उठे वत्स जीवात्मा अजर अमर है । इसका कभी भी नाश सम्भव नहीं है परंतु कारण विशेष ये विराट पुरुष के अंदर समाहित रहता है जैसे सागर का जल, पवन का झोंका, शब्द स्वर लहरियों की तरंग से भ्रमण करता जीवात्मा कई लोक भ्रमण करता कई प्रारब्ध में बंध जाता है अपने मूल स्वरूप को भूल कर व्याकुल रहता है वो कौन था कौन है और विराट पुरुष से बाहर आकर इतने भ्रमण कर लेता है कि वह अपने आप को भूल जाता है ।
इस विस्मृति में पाप और पुण्य का संचय करता है , परिवार में आता है , माँ-बाप , पति-पत्नी संतान और न जाने कितने रिश्तों में बंध कर कर्म बंधन में उसके प्रारब्ध बन जाता है और जन्म मृत्यु के भंवर में चौरासी लाख योनि में भ्रमण करता है पर इन सारे योनि में उसके प्रारब्ध से भोग भोगते पुण्य संचय के कारण मानव योनि को प्राप्त होता है । मानव योनि मिलने का एक ये भी कारण है कि जीवात्मा अपने मूल स्वरूप को देख ले , स्वयं का साक्षात्कार हो जाये और वह विराट पुरुष जो निर्गुण ब्रह्म निराकार जो साकार जगत का कारण हैं अतः सगुण साकार भी हैं उसको देख ले और इस कई कल्पों के भ्रमण से वह फिर उस परमात्मा में विलीन हो जाए  या उस परमात्मा को देखते हुए और भटके जीवात्मा की सहायता करने हेतु इस जगत में रहकर गुरु, साधु, संत, सिद्ध बन एक जनसमूह का मार्गदर्शन करे । मानव देह में भी कभी कभी सैकड़ो बार पुनः पुनः मानव देह प्राप्त होते रहते हैं । बहुत पाप कर्म अगर करने की प्रवृति हो तो ही नीचे की योनि में चला जाता है। इसी कारण मानव को , सनातन धर्म में ऋषि मुनियों ने गुरु बन कर पंचदेवता सहित अनेक ध्यान ,योग,जप, उपासना का मार्ग प्रदान किया ।
प्रारब्ध पाप कर्मों से विशेष बनते हैं जैसे आपने छल प्रपंच से किसी का धन बलात हड़प लिया, अपने सुख के लिए किसी का शील भंग किया, हत्या की या करवाई, समाज का शोषण किया , अच्छे लोगों को सताने रुलाने और कई प्रकार के पापकर्म के कारण जीवन में इन सारे पापकर्मों के प्रायश्चित के लिए हजारों वर्ष प्रेत योनि, नरकों में यमदूतों से भीषण दंड मिलता है । जिन लोगों को सताया वही अपना बदला लेने के लिए आपके परिवार या आसपास या जीवन में मिलते हैं अगर किसी पुण्य प्रभावों के कारण सद्बुद्धि, देवकृपा, गुरु का सानिध्य मिल जाये तो वह भोग भोगकर जीवात्मा पुण्यकर्मों की ओर अग्रसरित हो जाता है । विशालकाय पुरुष विदा लेते हैं ।
ज्ञानी कौन है ? जो जगत के प्रत्येक रहस्य में एक को भी जान ले । ऐसा न की किसी एक रहस्य को जानकर ये समझ ले की मैं पूर्ण को जान लिया हूँ । पूर्णता को प्राप्त के साथ जिसे सम्पूर्णता का ज्ञान हो जाये वही शिवत्व प्राप्त कर सकता है । सम+पूर्ण यानि जिसकी सम्यक दृष्टि हो, सम दृष्टि हो और यही दृष्टि महात्मा गौतम बुद्ध को प्राप्त थी । बौद्ध धर्म क्या है ? बाहर से जानो तो लगता है ये क्रिया योग की ध्यान साधन है इसमें कोई देव देवी की पूजन नही होती पर इनके धर्मचक्र के अंदर की प्रक्रिया को समझे तो पता चलेगा की हमारा सनातन धर्म कितना जीवंत और सारे धर्मों का सार है।
इनके पंथ में माँ तारा के साथ कई देव शक्तियां स्थापित हैं । कभी कभी विशेष कारण वश सनातन धर्म की बहुत सारी रहस्य छुपाना पड़ता है । पृथ्वी पर जो भी धर्म निकले उनके मूल में अगर देखें तो हर धर्म में सत्यता है । सभी धर्म एक मार्ग है परमात्मा के पास जाने का ,पर मूल यानि जड़ तो सनातन धर्म ही है। एक बात सुनने में आती है कि इस्लाम, ईसाई या हिन्दू लोग में से कुछ कोई पूजा, ध्यान नहीं करते कुछ भी नहीं मानते फिर भी वे  जीवित हैं, बलशाली, धनवान, विद्यावान हैं ,कुछ तो धर्म को गाली भी देते हैं, तो क्या ? वो भी तो सुखी हैं और जो हिन्दू या कोई धर्म का बहुत मानने वाला है परमात्मा, अल्लाह, देवी देवता को तो उन्हें भी कष्ट होता है । इससे क्या मतलब जो प्रारब्ध वश भाग्य में होगा वही तो होगा । व्यक्ति को कर्म करना चाहिए जो होना होगा उसे कोई बदल नही सकता ,
बिल्कुल सत्य है । लेकिन  जिस तरह प्रत्येक व्यक्ति के अंगुली के रेखा चित्र(finger print) एक दूसरे से नहीं मिल सकते उसी तरह प्रत्येक व्यक्ति का चिंतन एक नहीं हो सकता । बहुत समानता होने के बाद भी कुछ न कुछ भिन्नता होगी और अध्यात्म के अति महत्वपूर्ण सोपान है कि आत्मा को परमात्मा में मिल जाना तो जिस दिन यह रेखा चित्र एक दूसरे से मिल जाये उसी दिन मुक्ति सम्भव है कारण आत्मा आत्मा से मिल क्या कर लेगी जब तक परमात्मा न मिल जाये और वहाँ तक पहुँचने का सबसे प्यारा सबसे सरल सबसे सुंदर मार्ग है वही हमारा सनातन धर्म है।
सनातन सत्य ही जीवन का मूल है केंद्र है । सब घटनाएं नियति है पर हमारा कर्म स्वतंत्र है हमारे जीवन में जो विधि का विधान निश्चित है परंतु हम सत्य में सनातन धर्म, संस्कृति को गहराई और एक निर्दोष दृष्टि से देखे तो अपने पिछले प्रारब्ध को बदल सकते हैं, प्रायश्चित करने की चिंतन दैव कृपा से प्राप्त हो जाये तो हम सनातन के मार्ग पर चल पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं लेकिन अहंकार बस विवाद, तर्क, एक दूसरे की आलोचना में पूरा जीवन नष्ट हो जाता है ।
जो हम कर्म करते हैं वही कर्म हमारा भाग्य है हमारे जीवन के सारे सुख दुख में परमात्मा कहीं दोषी नहीं जो हमने बोया है वही तो काटना पड़ेगा।हर व्यक्ति की ऊर्जा अलग अलग है और जो ऊर्जा है वे शक्ति रूपणी है जिसके 36 तत्व है जिसमे से मुख्य 5 तत्व से जीव का निर्माण हुआ है । 36 तत्व ही महाप्रेम है,24 तत्व विशुद्ध प्रेम है और 16 तत्व प्रेम है अब इन सोलह तत्व प्राप्त करने के लिए हम पंचतत्वों से युक्त मानव को 11 तत्व पार करना पड़ता है तब हम कभी खंडित नहीं होते । इन 11 तत्व में (1)हमारे दैनिक दैहिक शुद्धकर्म (2)हमारे मानसिक शुद्ध चिंतन(3)ईश्वर के प्रति श्रद्धा(4)सबके प्रति दया और किसी के प्रति ईर्ष्या न होना(5)ध्यान, योग, पूजन(6)कुंडलिनी साधन या मंत्र जप(७)गुरु और ईष्ट में पूर्ण निष्ठा(८)काम का सही उपयोग(9)जगत के आवागमन का कारण, उसपर चिंतन(10)अपने पारिवारिक, सामाजिक कर्तव्यों का पूर्ण निष्ठा से पालन करना, अच्छे रिश्ते का निर्वाह करना(11)खानपान पर ध्यान देना, चरित्रवान होना, अपशब्दों का प्रयोग न करना।
शिव का प्रेम शक्ति, सती के वियोग में जब उनके शव लेकर करुण विलाप करते हुए शिव महाप्रेम में डूबे हुए तभी विष्णु ने को आना पड़ा और राधा जो हरपल विरह में प्रेम में खोई रही उनका प्रेम विशुद्ध है त्याग सर्वस्व अर्पण किया कृष्ण के लिए महाप्रेम में स्थित अपने लिए कुछ नहीं जो है श्री कृष्ण के लिए और कृष्ण राधा को हरपल अपने हृदय में रख जगत का कल्याण करते रहे।
प्रेम की परिभाषा पर कितने मन्तव्य पर प्रेम को महसूस करने के लिए राधा और शिव और हनुमान जैसी हृदय चाहिए । जो सभी जीव के पास परमात्मा ने प्रदान किया है, राधा महाप्रेम में हैं कृष्ण साथ हैं , शिव विशुद्ध प्रेम में हैं, शक्ति साथ हैं । हनुमान प्रेम में है साथ राम हैं सीता हैं ।हनुमान जिसके प्रेम में हैं वह सीताराम महाप्रेम हैं हरि विष्णु ,महाविष्णु ,नारायणी, महालक्ष्मी, भुवनेश्वरी ...हनुमान ने प्रेम किया, भक्ति की, सेवक बने, अहंकार शून्य, सिर्फ प्रेम किया तब विशुद्ध प्रेम प्रकट हुआ । अपना कुछ नहीं जिससे प्रेम किया उसके लिए सर्वस्व अर्पण तब उन्होंने अपने हृदय में महाप्रेम को धारण किया और सारे भेद समाप्त हो गए । शिवांश हनुमान तीन विराट सत्ता में एकाकार हो गए और आज इस जगत में सदेह उपस्थित जीव को हर संकट से मुक्त कर वहाँ तक ले जाते हैं जहाँ तक जाने के लिए हजारों जन्म जीव का आवागमन है।
सभी का जीवन इन तीन रंगों में समाहित होता है तो जीव अष्टपाश से मुक्त होता है।प्रेम विशुद्ध प्रेम के बिना खंडित हो जाता है पर यही प्रेम जब विशुद्ध प्रेम में परिवर्तित हो जाये तो खंडित नही होता।
जो देव शक्तियां हैं वे भी कभी कभी मनुष्य योनि में आ जाती हैं । मानव का जीवन भी इन तीन तत्व की प्राप्ति का मार्ग है पर प्रारब्ध वश लोग भटक कर उलझ जाते हैं और सत्य से दूर चले जाते हैं।इस जगत में इतने मार्ग है सभी सुंदर और सत्य का मार्ग है जिनको जिसपर चलना है वे स्वतंत्र हैं पर इसके लिए विवेकपूर्ण ज्ञान आवश्यक है।
छोटी छोटी बात पर गलतफहमियों में जो प्रेम को ही नष्ट करते हैं वो प्रेम नहीं वह मोहजनित भोग है इसमें सर्वस्व अर्पण कहाँ है ? ये तो एक हल्के झोंके से बिखर जाने वाली मानव पतन की कहानी है।
अक्षर ब्रह्म महाशून्य के इस पार ,स्वर की शक्ति की महायान जिसपर अस्त्र शस्त्र और जिसपर तीन विराट सत्ता प्रेम,विशुद्ध प्रेम, महाप्रेम जिनके आँखों में करुणा, दया, वात्सल्य के साथ अस्त्र शस्त्र लिए वे शक्तियां जो घृणा, अहंकार, लोभ के साथ आँखों से खून की आंसू जो विरह वेदना से मर्माहत एक शांति की चाह।    क्रमशः

Sunday, May 6, 2018

I sell a house

Hello, I sell a house in Santander Spain for an amount of € 1400000 (you must pass it to your currency to see the exact amount). If you are interested in buying it, please send me a message and I will explain more details. I send you the plans of the house in PDF format.
Thanks for your time


Wednesday, May 2, 2018

साकार सपन 

कभी कुछ करने का मन में ,सपन हमने संजोया था 
प्यार से एक पौधे को  , जतन  से  हमने बोया था 
संवारा हमने तुमने मिल ,बड़ी मेहनत से सींचा है 
खुदा की मेहरबानी से ,गया बन अब ,बगीचा है 
बहारें आई अब इसमें ,फूल कितने महकते है 
दरख्तों पर ,रसीले से ,हजारों फल लटकते है 
यही कोशिश है हरदम ,कि आये कोई भी मौसम 
फले,फूले और हरियाली ,सदा इसकी रहे कायम 

मदन मोहन बाहेती;घोटू;
मेरी राधायें 

मेरे जीवन की कितनी ही राधायें 
रह रह कर के याद मुझे वो अक्सर आये 
मेरी पहली राधा मेरी पड़ोसिन थी 
जो नाजुक सी प्यारी,सुन्दर,कमसिन थी 
उसकी सभी अदाये होती दिलकश थी 
हाँ,वो ही मेरा सबसे पहला 'क्रश 'थी 
जिसे देख कर मुझको कुछ कुछ होता था 
मैं उसकी उल्फत के सपन संजोता था 
वो भी तिरछी नज़र डाल ,मुस्काती थी
 मेरे दिल पर छुरियां कई चलाती थी 
कभी पहल  मैं करता,नज़र झुकाती वो 
कभी पहल वो करती ,पर शर्माती वो 
चहल पहल होती थी लेकिन दूरी से 
मिलन हमारा हो न सका ,मजबूरी से 
उसकी चाहत में थे मेरे सपन रंगीले 
पर कुछ दिन में हाथ हो गए उसके पीले 
उस दिन पहली बार दिल मेरा टूटा था 
चखा प्यार का स्वाद ,किसी ने लूटा था
ये मन  मुश्किल  से समझा था ,समझाये 
मेरे जीवन की कितनी ही राधाये 
जो रह रह कर याद मुझे अक्सर आये 
दूजी राधा , सिस्टर जी  की सहेली थी 
उसे समझना मुश्किल ,कठिन पहेली थी
 यूं तो मुझको देख प्यार से मुस्काती 
पास जाओ तो बड़ा भाव थी वो खाती 
चंचल बड़ी ,चपल थी और सुहानी थी 
मैंने था तय किया कि वो पट जानी थी 
वेलेंटाइन डे पर उसे गुलाब दिया 
मंहगी मंहगी गिफ्टों से था लाद दिया 
इम्पोर्टेड चॉकलेट उसे थी  खिलवाई 
पर  वो लड़की ,मेरे काबू  ना आयी 
इसके पहले कि मैं आगे बढ़ पाता 
उसकी ऊँगली पकड़ ,कलाई पकड़ पाता 
मेरी प्यारी , सुंदर सी वो वेलेंटाइन 
हुई किसी लाला के घर की थी  लालाइन
और बह गए आंसूं में थे मेरे अरमां 
सुनते चार पांच बच्चों की है अब वो माँ  
सोचूं उसके बारे में ,तो मन तड़फाये 
मेरे जीवन की कितनी ही राधायें 
रह रह कर वो याद मुझे अक्सर आये 
कितनी राधायें ,यूं आयी जीवन में 
मीठी खट्टी यादें घोल गयी मन में 
था कोई का करना मस्ती मौज इरादा 
करने टाइम पास बनी थी कोई राधा 
कई बार हम खुद को समझे सैंया थे 
उन राधाओं के कितने ही कन्हैया थे 
लेकिन जो भी मिली वो सभी  राधाये 
जिनने पार करी  जीवन की बाधाएं 
कोई बन चुकी अब कोई की रुक्मण है 
कोई रम गयी,पूरी आज गृहस्थन है 
कोई  दुखी है अब तक अपने कंवारेपन में  
कोई रह रही  'लिविंग इन के  रिलेशन' में 
हमने अब राधा का चक्कर छोड़ दिया है 
फेरे ले ,रुक्मण संग ,मन को जोड़ लिया है 
अब समझे ,राधायें तो है आती,जाती 
पर रुक्मण ही जीवन भर का साथ निभाती 
बहुत सुख मिला ,उसको अपने हृदय बसाये 
फिर भी जीवन में आयी कितनी राधाये 
रह रह कर जो ,याद मुझे है अक्सर आये 

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
हम ओ सी के वासी 

ये ही हमारा वृन्दावन है ,ये ही मथुरा ,काशी 
शांति,प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी 

वानप्रस्थ की उमर ,जवानी का जज्बा है सब में 
मन में सेवा भाव भरा है  और  आस्था रब  में 
राधाकृष्ण यहीं मंदिर में ,दुर्गा माँ और हनुमन 
भक्तिभाव में और कीर्तन में ,रमता है सबका मन 
शर्बत,छाछ छबीले लगते ,और होते  भंडारे 
जन्म दिवस की ख़ुशी मनाते है मिलजुल कर सारे 
खुल कर हँसते लाफिंगक्लब में,मन में नहीं उदासी 
शांति प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी
 
सुबह सुबह व्यायाम केंद्र में ,नित होती है कसरत 
काम सभी के सब आते है,जब भी पड़ती जरूरत 
क्रीड़ास्थल पर बच्चे  खेलें , और  गूंजे  किलकारी  
फव्वारों के पास मारती ,गप्पें ,महिला  सारी 
कोई सैर सवेरे करता ,कोई 'जिम' में जाता 
हमें यहाँ   दिखता हर चेहरा ,हँसता और मुस्काता 
खुशियां बरसे सदा,अमावस हो या पूरनमासी 
 शन्ति प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी 

मदन मोहन बाहेती ' घोटू '

Monday, April 30, 2018

पढ़ाना हमको आता है 

चने के झाड़ पर सबको, चढ़ाना हमको आता है 
कोई भी काम में टंगड़ी अड़ाना  हमको आता है 
भले ही खुद परीक्षा में ,हो चुके फैल हो लेकिन,
ज्ञान का पाठ औरों को ,पढ़ाना हमको आता है 
कोई की भी पतंग को जब ,देखते ऊंची है उड़ती ,
तो उसको काटने पेंचें ,लड़ाना हमको आता है 
किसी की साईकिल अच्छी ,अगर चलती नज़र आती ,
उसे पंक्चर करें ,कांटे गड़ाना हमको आता है 
बिना मतलब के ऊँगली कर मज़ा लेने की आदत है ,
बतंगड़ बात का करके ,बढ़ाना  हमको आता है 
न तो कुछ काम हम करते ,न करने देते औरों को ,
कमी औरों के कामो में ,दिखाना हमको आता है 
हमारे सुर में अपना सुर ,मिला देते है कुछ चमचे ,
यूं ही हल्ला मचाकर के सताना हमको आता है 

घोटू 
बुढ़ापा छाछ होता है 

दूध और जिंदगी का एक सा अंदाज होता  है 
जवानी दूध होती है , बुढ़ापा   छाछ  होता है
 
दूध सा मन जवानी में ,उबलता है ,उफनता है ,
पड़े शादी का जब जावन ,दही जैसा ये जमता है 
दही जब ये मथा जाता ,गृहस्थी वाली मथनी में 
तो मख्खन सब निकल जाता ,बदल जाता है जो घी में 
बटर जिससे निकल जाता ,बटर का मिल्क कहलाता 
जो बचता लस्सी या मठ्ठा , गुणों की खान बन जाता 
कभी चख कर तो देख तुम ,बड़ा ही स्वाद होता है 
जवानी दूध  होती है , बुढ़ापा  छाछ  होता है 

दूध से छाछ बनने के ,सफर में झेलता मुश्किल 
गमाता अपना मख्खन धन ,मगर बन जाता है काबिल 
न तो डर  डाइबिटीज का ,न क्लोरोस्ट्राल है बढ़ता 
बहुत आसानी से पचता ,उदर  को मिलती शीतलता 
खटाई से मिठाई तक ,करने पड़ते है समझौते 
बुढ़ापे तक ,अनुभवी बन,काम के हम बहुत होते 
पथ्य बनता ,बिमारी का कई, ईलाज होता है 
जवानी दूध होती है ,बुढ़ापा  छाछ  होता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, April 25, 2018

वो अब भी परी है 

मेरी बीबी अब भी ,जवानी भरी है 
सत्रह बरस की ,लगे छोकरी  है 
उम्र का नहीं कोई उसमे असर है ,
निगाहों में मेरी वो अब भी परी है
 
भले जाल जुल्फों का ,छिछला हुआ है 
भले पेट भी थोड़ा ,निकला हुआ है 
हुई थोड़ी मोटी  ,वजन भी बढ़ा है 
भले आँख पर उनकी ,चश्मा चढ़ा है
मगर अब भी लगती है आँखें नशीली 
रसीली थी  पहले ,है अब भी रसीली 
वही नाज़ नखरे है वही है अदाए 
सताती थी पहले भी,अब भी सताये 
नहीं आया पतझड़,वो अब भी हरी है 
निगाहों में मेरी ,वो अब भी परी  है
 
भले अब रही ना वो दुल्हन नयी है 
दिनोदिन मगर वो निखरती गयी है 
भले तन पे चरबी ,जरा चढ़ गयी है 
मुझसे महोब्बत ,मगर बढ़ गयी है , 
बड़ी नाज़नीं ,खूबसूरत ,हसीं थी 
ख्यालों में मेरे जो रहती  बसी थी 
मगर रंग लाया है अब प्यार मेरा 
रखने लगी है वो अब ख्याल मेरा 
कसौटी पे मेरी ,वो उतरी  खरी है 
निगाहों में मेरी ,वो अब भी परी है

महकती हुई अब वो चंदन बनी है 
जवानी की उल्फत,समर्पण बनी है 
संग संग उमर के मोहब्बत है बढ़ती 
जो देखी है उसकी ,नज़र में उमड़ती 
 हम एक है अब ,नहीं दो जने है 
हम एक दूजे पर  ,आश्रित बने है   
जवानी का अब ना,रहा वो जूनून है 
देता मगर साथ उसका सुकून है 
मैंने सच्चे दिल से ,मोहब्बत करी है 
निगाहो में अब भी वो लगती परी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '