*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Wednesday, January 3, 2018

नया बरस -पुरानी बातें 

इस नए बरस की बस ,इतनी सी कहानी है 
कैलेंडर नया लटका ,पर कील पुरानी  है 
महीने है वो ही बारह,लेकिन कुछ वारों ने ,
कुछ तारीखों के संग ,की छेड़ा खानी है 
सर्दी में ठिठुरना है,ट्रेफिक में फंसना है ,
होटल है बड़ी मंहगी ,बस जेब कटानी है 
 दो पेग चढ़ा कर के ,दो पल मस्ती कर लो,
सर भारी सुबह होगा ,'एनासिन'  खानी है 
बीबी से नज़र बचा ,खाया गाजर हलवा 
लग गया पता उसको अब डाट भी खानी है 
कितने ही 'रिसोल्यूशन 'नव वर्ष में तुम कर लो,
संकल्पो की बातें ,दो दिन में भुलानी है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, January 2, 2018

नमस्ते



Hello
I have a charitable project for you to help me execute in your country, contact me for more information at this e-: simonshann@mynet.com
Mr Simon shan

Monday, January 1, 2018

नववर्ष 

कल ,
दिन बदल जाएगा 
महीना बदल जाएगा
 वर्ष बदल जाएगा 
तारीख बदल जायेगी 
कैलेंडर बदल जाएगा 
डायरी बदल जायेगी 
और तो और ,
सूरज के उगने और 
अस्त होने का,
 समय भी बदल जाएगा 
नहीं बदलेगा तो आसमान,
जो जितना विस्तृत था ,
उतना ही विस्तृत रहेगा 
और मेरा तुम्हारे प्रति प्यार ,
नए वर्ष के आ जाने पर भी,
जैसा पहले था वैसा ही रहेगा 
अक्षुण था और अक्षुण ही रहेगा 
हमेशा की तरह 
हमेशा 

घोटू 

धूप भरी सन्डे दोपहरी -वर्किंग कपल की 

आओ ,जिंदगी के कुछ लम्हे ,संग बितालें ,हम तुम मिल कर 
गरम धूप में ,तन को सेकें ,खाएं मूंगफली  छील  छील  कर
आओ मतलब हीन करें कुछ बातें यूं ही बचपने  वाली 
या फिर सूरज की गर्मी में  चुप  चुप बैठें,खाली खाली 
आओ बिताये ,कुछ ऐसे पल ,जिनमे कोई फ़िक्र नहीं हो 
घर की चिंताएं ,दफ्तर की बातों का कुछ  जिक्र नहीं हो 
इस सर्दी के मौसम की ये प्यारी धूप भरी ,दोपहरी 
उसपर रविवार की छुट्टी,लगे जिंदगी ,ठहरी ठहरी 
पियें गरम चाय ,चुस्की ले ,संग में गरम पकोड़े खायें 
हफ्ते भर में ,एक दिवस तो,हंस कर खुद के लिए बितायें 
लेपटॉप ,मोबाईल छोड़े,यूं ही बैठें, हाथ पकड़ कर 
वरना कल से वही जिंदगी ,तुम अपने ,मैं अपने दफ्तर 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Friday, December 22, 2017

८० से ९० के दशक के  गीत 

१ कोई कंवरी कन्या जब सपने बुनती है तो अपने लिए एक राजकुमार चुनती है 
जो सफ़ेद घोड़े पर होकर सवार ,मन में भरे प्यार -आएगा उसके द्वार और ले जाएगा 
अपने साथ --इन्तजार तो पिछले दशक की नायिका भी करती थी पर उसमे 
संजीदगी होती थी पर इस दशक की नाइका के इन्तजार में थोड़ा चुलबुलापन आ 
गया है और किसी के ख्वाबों  में डूबी वो जाती है एक गीत जो शमत निधि हांडा 
के स्वर में सुनिए 
मेरे ख्वाबों में जो आये 

२ पिछले दशक का नायक किसी की मुस्कराहटों पर निसार होकरऔर किसी के प्यार में डूबा 
रहने को ही असली जीने का नाम देता है तो दो दशक बाद का नायक भी आशिकी को 
अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ कर आशिकी के लिए एक सनम की तलाश करता है 
एक नए अंदाज में  -हमारे प्रिय अनिल जाजू के स्वर में सुनिए 
बस एक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए 

३ धीरे धीरे प्यार परवान चढ़ता है -बातें होती है -मुलाकातें होती है -दोनों एक रंग में रंग जाते है 
प्यार के रंग में और नायिका कभी उसे परी लगती है ,कभी सपनो की रानी और वो अपनी
 प्रेमिका से पूछ बैठता है  -सुनिए श्री अनुपम खरबंदा के स्वरों में -
मेरे रंग में रँगनेवाली 

४ प्यार की आग दोनों तरफ लगी हुई है -उधर नायक बेचैन इधर नायिका बेकरार  पल भर की 
जुदाई भी सहन नहीं होती -कहते है ना -
जुदाई में जर्द चेहरा हो गया है ,हिज्र की हर सांस भरी हो गयी है 
याद में तेरी वो हालत बन गयी ,लोग कहते है बिमारी हो गयी है 
और इसी बिमारी की- बिगड़ी बिगड़ी सी हालत में  नायिका  के कंठ से गीत निकल पड़ता है 
जो आप सुनिए श्रीमती मोना जी के स्वरों में 
दिल दीवाना बिन सजना के माने ना ----


५ समय बीतता है -मुलाकातें बढ़ती है -प्रेमी प्रेमिका का दिल एक दूजे बिन नहीं लगता 
उन्हें लगता है की उन दोनों ने मिल कर एक नया संसार पा लिया है -उनके सारे सपने 
पूरे हो गए है और वो मिल कर गाते है एक गीत जो आप सुनेगे श्री अनुपम खरबंदा और 
विनीता कुमार जी के स्वरों में 
मिल के -ऐसा लगा तुम से मिल के 


६ सामजिक बंधनो को काट कर जब प्रेमी एक दुसरे में खो जाते है -दीवाने हो जाते है 
तो मस्ती के वो पल खत्म होने का नाम ही नहीं लेते  -प्यार का नाश जो चढ़ता है ,उतदुनिया रता ही नहीं 
मन बस उसी मस्ती में जाता और झूमता है और गाता  है सुनिए
 श्रीमती नूपुर त्रिपाठी जीऔर मनीष यादव  के स्वरों में 

थोड़ा सा झूम लू मै 

७ कहते है की मिलन की राह आसान नहीं है -  ये दुनिया दो प्रेमियों को आसानी से मिलने नहीं देती 
कारण कुछ घरेलू-कुछ गलतफहमियां या और भी कुछ ऐसे हालत पैदा हो जाते है की न चाहते हुए भी 
दोनों के मिलन के बीच में एक दीवार कड़ी हो जाती है और दिल के टुकड़े टुकड़े होने लगते है 
ऐसे वक़्त में अपने मन की भावनाओं को व्यक्त करती हुई नायिका श्रीमती विनीता कुमार के स्वरों में जाती है 

शीशा हो या दिल हो ,एक दिन टूट जाता है 

८ उधर प्रेमी का दिल टूटा हुआ होता है इधर प्रेमिका का -उनके दिलों ने अरमानो की जो बस्ती बसाई थी 
वह ढहने लगती है -दुखी नायिका अपनी पीड़ा को ग़ज़ल के रूप में जाती है श्वेता बहती तेल के स्वरों में 

दिल के अरमान आंसुओ  में बह गए 

९ आपको याद होगा फिल्म मदर इण्डिया का वो गीत जो नरगिस ने गाय था बीते दशक में 
दुनिया में जो आये तो जीना ही पड़ेगा 
जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा 
उसी परिस्तिथि में उलझा आज का नायक अपने आप को कैसे समझाता है 
सुनिए श्री अनिल जाजू के शब्दों में 

अब तेरे बिन। जी लेंगे हम 

१० और अब गलत फहमिया दूर हो गयी -बीच की दीवार  ढह गयी 
तो ,किस्मत ने साथ  दिया और बिगड़ी बात बन गयी  तो नायक अपनी नायिका 
को सांत्वना देते हुए समझाता है -सुनिए अनिल जाजो के स्वर में 

जब कोई बात बिगड़ जाए जब कोई मुश्किल पद जाए 

Thursday, December 14, 2017

उत्तेजना 

उत्तेजना ,
शरीर की वो अवस्था है 
जिसमे शरीर के ज्वालामुखी का ठंडा पड़ा खून ,
लावे सा पिघलता है 
तन मन में होने लगता है कम्पन 
कितनी ही बार और कितने तरीकों से ,
जीवन में आते है ऐसे क्षण 
जैसे जब गरीब की सहनशीलता ,
जब अपनी सीमाएं पार कर जाती है 
तो उसके मन में ,
विद्रोह की उत्तेजना भर जाती है 
इसका कारण होता है उसकी मजबूरी और बेबसी 
समाज की उपेक्षा,व्यंग और हँसी 
आदमी खुद को और अपनी किस्मत को कोसता है 
फिर कैसे भी बदला लेने की सोचता है 
ऐसेलोगों की उत्तेजित भीड़ के स्वर 
देते है सत्ताएं बदल  
या फिर कोई ऊंचा पद पाकर 
और अपनी प्रतिष्ठा पर इतराकर 
जब आदमी में भर जाता है अहंकार 
तो थोड़ी सी अवहेलना होने पर ,
उत्तेजना पूर्ण हो जाता है उसका व्यवहार 
अपने अहम की संतुष्टी न होने पर ,
वह क्रोध से भर जाता है 
उसका विवेक मर जाता है 
वह अपमानित महसूस कर अंटशंट बकता है 
और उसमे भर जाता है आक्रोश 
और इसका बदला लेकर ही उसे मिलता है संतोष 
इतिहास गवाह है 
ऐसी उत्तेजना करते अफसर,नेता और शहंशाह है 
तीसरा छोटी छोटी बातों पर बिना मतलब 
कोई बिगड़ जाता है जब तब 
गुस्से में नाराज हो वार्तालाप करने लगता है 
अनर्गल प्रलाप करने लगता है 
लड़ने को आतुर हो जाता है 
अपनी औकात  से बाहर निकल जाता है 
ऐसी तुनकमिजाजी भी होती है एक बीमारी 
कम कूवत ,गुस्सा भारी 
और उत्तेजना का चौथा रूप 
होता है बड़ा प्यारा और अनूप 
जब यौवन की चपलता और रूप की सुगढ़ता,
देती है प्यार का आव्हान 
तो आदमी की शिराओं में ,
उमड़ता है भावनाओं का तूफ़ान 
जो तोड़ देता है सारे बंधन 
और उत्तेजित कर देता है तन मन 
उत्तेजना के ये क्षण 
होते है विलक्षण 
आदमी भाव विभोर हो जाता है 
एक दूसरे में खो जाता है 
ये उत्तेजना बड़ी मतवाली होती है 
बड़ी सुखकर और प्यारी होती है 

मदन मोहन बहती]घोटू]

Tuesday, December 12, 2017

हुस्न की मार से बचना 

नजाकत से,नफासत से ,अदाओं से करे घायल 
और उनकी मुस्कराहट भी ,बड़ी ही कातिलाना है 
बड़ी मासूम सी सूरत ,बड़ी चंचल  निगाहें है 
काम इन हुस्न वालों का,कयामत सब पे ढाना है 
जरूरी ये नहीं होता ,कि हर एक फूल कोमल हो,
टहनियों पर गुलाबों की ,लगा करते है कांटे भी 
हथेली फूल सी नाजुक,सम्भल कर इनको सहलाना ,
ख़फ़ा जो हो गए ,इनसे,लगा करते है चांटे  भी 
बड़ी ही खूबसूरत सी ,उँगलियाँ उनकी कोमल है ,
नजाकत देख कर इनकी ,आप क्या सोच सकते है 
सिरे पर उँगलियों के जो, दिए नाख़ून कुदरत ने,
कभी हथियार बन ये आपका मुंह नोच सकते है 
गुलाबी होठ उनके देख कर मत चूमने बढ़ना,
ये गुस्से में फड़क कर के ,तुम्हे है डाट भी सकते 
छिपे है दांत तीखे  इन गुलाबी पखुड़ियों पीछे ,
हिफ़ाजत अपनी करने को ,तुम्हे है काट भी सकते 
रंगे हो नेल पोलिश से  ,निखारे रूप नारी का ,
प्रेम में बावले होकर ,ये नख है  क्षत किया करते 
पराकाष्ठा हो गुस्से की ,तो ये हथियार बन जाते ,
बड़ी आसानी से दुश्मन ,को ये आहत किया करते 
ये कटते ,खून ना आता ,तभी  नाखून कहलाते,
बड़ी राहत ये देते है ,बदन को जब खुजाते  है 
हमारे जिस्म पर एक बाल है और एक नाखून है ,
कोई चाहे या ना चाहे,दिन ब दिन बढ़ते जाते है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
विराट 

मेरा विराट है ये 
क्रिकेट सम्राट है ये 
खिलाडी  है   धुरंधर 
जोश है जिसके अंदर 
नहीं कोई से डरता 
रनो की बारिश करता 
खेलता है जब जमकर 
देखते है सब थमकर
मेरा विराट है ये 
क्रिकेट सम्राट है ये  
सभी का प्यारा है ये,खिलाड़ी सबसे सुन्दर 
दनादन मस्त कलंदर ,दनादन मस्त कलंदर 
इरादे इसके पक्के 
मारता चौके,छक्के 
कापने लगता दुश्मन 
हांफने लगता दुश्मन 
 खेलता है जब जमकर 
देखते है सब थम कर 
मेरा विराट है ये 
क्रिकेट सम्राट है ये 
खड़ा जब ये करता है ,रनो का एक समन्दर 
दनादन मस्त कलंदर,दनादन मस्त कलंदर 
शेर बन जाते बिल्ली 
उड़े जब उनकी गिल्ली 
क्रिकेट का ये दीवाना 
खिलाड़ी बड़ा सयाना
खेलता है जब जमकर 
देखते है सब थमकर 
मेरा विराट है ये 
क्रिकेट सम्राट है ये  
सेन्चुरी मारा करता,मिले जब कोई अवसर 
दनादन मस्त कलंदर,दनादन मस्त कलंदर 
क्रिकेट की जान है ये 
देश की शान है ये 
जहाँ भी जाकर खेले 
रनो की बारिश पेले
मेरा विराट है ये 
क्रिकेट सम्राट है ये 
खेलता है जब जमकर 
देखते है सब थमकर  
सभी से रखे बनाकर ,खिलाडी सबसे सुन्दर 
दनादन  मस्त कलंदर,दनादन  मस्त कलंदर
टेस्ट हो या फिर वनडे 
इसके आगे सब ठन्डे  
कोई ना आगे ठहरे 
जीत का झंडा फहरे 
मेरा विराट है ये 
क्रिकेट सम्राट है ये 
खेलता है जब जमकर 
देखते है सब थमकर 
ट्वेंटी ट्वेंटी में भी ,कोई ना इससे बेहतर 
दनादन मस्त कलंदर ,दनादन मस्त कलंदर 
ले गयी दिल है उसका 
मिल गयी उसे अनुष्का
सेन्चुरी मारी लव  ने  
बना दी जोड़ी रब ने 
रनो सी खुशियां बरसे 
जिंदगी उनकी हरषे 
दुआ है ये हम सबकी 
मेहर हो उन पर रब की
 प्यार में डूबे रह कर 
रहे ये खुश  जीवन भर 
दनादन मस्त कलंदर ,दनादन मस्त कलंदर 

मदन मोहन बाहेती'घोटू 
मैं गधे का गधा ही रहा 

प्रियतमे तुम बनी ,जब से अर्धांगिनी ,
      मैं हुआ आधा ,तुम चौगुनी बन  गयी 
मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
         गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 
मै तो दीपक सा बस टिमटिमाता रहा ,
        तुम शीतल,चटक चांदनी बन गयी 
मैं तो कड़वा,हठीला रहा नीम ही,
     जिसकी पत्ती ,निबोली में कड़वास है 
पेड़ चन्दन का तुम बन गयी हो प्रिये ,
  जिसके कण कण में खुशबू है उच्छवास है 
मैं तो पायल सा खाता रहा ठोकरें ,
    तुम कमर से लिपट ,करघनी बन गयी 
मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा ,
       गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 
मैं था गहरा कुवा,प्यास जिसको लगी ,
     खींच कर मुश्किलों से था पानी पिया 
तुम नदी सी बही ,नित निखरती गयी ,
     पाट चौड़ा हुआ ,सुख सभी को दिया 
मैं तो कांव कांव, कौवे सा करता रहा ,
            तुमने मोती चुगे ,हंसिनी बन  गयी    
मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
        गाय थी तुम प्रिये, शेरनी बन गयी 
मैं तो रोता रहा,बोझा ढोता रहा ,
         बाल सर के उड़े, मैंने उफ़ ना करी 
तुम उड़ाती रही,सारी 'इनकम' मेरी,
        और उड़ती रही,सज संवर,बन परी   
मैं फटे बांस सा ,बेसुरा  ही रहा,
          बांसुरी तुम मधुर रागिनी बन गयी
मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा,
          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी  
फ्यूज ऐसा अकल का उड़ाया मेरी ,
           सदा मुझको कन्फ्यूज करती रही 
मैं कठपुतली बन  नाचता ही रहा ,
          मनमुताबिक मुझे यूज करती रही
मैं तो कुढ़ता रहा और सिकुड़ता रहा ,
          तुम फूली,फली,हस्थिनी  बन गयी 
मैं गधा था गधे का गधा ही रहा ,
          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी   
ऐसा टॉफी का चस्का लगाया मुझे,
        चाह में जिसकी ,मैं हो गया बावला 
अपना जादू चला ,तुमने ऐसा छला ,
           उम्र भर नाचता मैं रहा मनचला 
मैं दिये  की तरह टिमटिमाता रहा,
     तुम शीतल ,चटक चांदनी बन गयी 
मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन  गयी 
         
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
किशोर अवस्था का अधकचरा कस्बाई इश्क़ 

बीत जाती है जब बचपन की उम्र सुहानी 
और थोड़ी दूर होती है जवानी 
ये उमर का वो दौर होता है 
जब आदमी किशोर होता है 
जवानी की आहट ,आपकी  मसें भिगोने लगती है
और  आपकी  बातें प्रायवेट होने लगती है  
जब आप फ़िल्मी हीरो की तरह ,
खुद को संवारने लगते है 
और आईने के सामने खड़े होकर ,
खुद को निहारने लगते है 
जब आप अपनी लुक्स के प्रति ,
थोड़े जागरूक  होकर बोलने लगते है 
और  अपनी बाहुओं को दबा,
अपनी मसल्स टटोलने लगते है 
जब आप अपने होठों को गोल करके ,
बजाने लगते व्हिसिल है 
हर सुंदरी पर ,आ जाता आपका दिल है 
जी हाँ ,हम सबकी जिंदगी 
उमर के इस दौर से गुजरी है 
आज भी जब कभी कभी ,
वो बीती यादें होती हरी है 
तो याद आ जाते है वो दिन ,
जब हम नौसिखिये आशिक़ हुआ करते थे 
गाँव की हर सुन्दर लड़की पर मरते थे 
उन दिनों हमारा इश्क़ कस्बाई होता था 
अलग अलग तरीकों से ट्राई होता था 
क्योंकि तब  न  व्हाट्सएप था ,
न वाई फाई होता था 
न फेसबुक न ई  मेल होता था 
बस आँखों ही आँखों में सारा खेल होता था 
जिसमे कोई पास और कोई फ़ैल होता था 
कोई लड़का ,किसी लड़की को ,
टकटकी लगा कर देखता तो उसे ताड़ना कहते थे 
और दोनों आंख्यों में से एक आँख को,
किसी को देख कर ,क्षणिक रूप से बंद कर खोलने को 
आँख मारना कहते थे 
कोई चीज ,प्रत्यक्ष रूप से किसी पर फेंकी नहीं जाती ,
फिर भी लोग फेंकते हुए नज़र आते है 
ऐसे लोग ,दिलफेंक लोग कहलाते है 
तो  लड़की को पटाने के लिए ,
पहले हम लड़की को ताड़ते थे 
फिर आँख मारते थे 
फिर सामने वाली का रिएक्शन देखते थे 
फिर उस पर दिल फेंकते थे 
ये सब क्रियाये मौन रूप से होती थी 
प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती थी 
पर उन दिनों दोस्ती ऐसे ही बढ़ती थी 
 हमारा पार्ट टाइम शगल होता था ,
येन केन प्रकारेण लड़की को पटाना 
और बात नहीं बने तो छटपटाना 
जब किसी की किसी से आँख लड़ती थी 
तो थोड़ी बात आगे बढ़ती थी 
और हम यार दोस्तों में डींगे मारते थे 
'आज वो हमको देख कर मुस्कराई थी'
शेखी बघारते थे 
अपने छोटे छोटे अचीवमेंट,
 दोस्तों से शेयर करते थे 
और माशूका का नाम लेकर आहें भरते थे 
हमारा एक मित्र जिसका बाप मंदिर का था पुजारी
और आरती के बाद ,
जब आती थी प्रसाद बांटने की बारी  
तो वो अपनी मनपसंद लड़की को ,
प्रसाद देने के बहाने उसका हाथ दबा देता था ,
थोड़ा ज्यादा प्रसाद पकड़ा देता था 
और इस तरह बात आगे बढ़ा देता था 
एक दोस्त लाला का लड़का था ,
जो सौदा लेने आई लड़की को ,
एक दो टॉफी मुफ्त में पकड़ा ,
उसके हाथ सहला लेता था 
और इस तरह अपना मन बहला लेता था 
कितने ही क्षणभंगुर अफेयर ,
कितनो के ही साथ हुए और टूटे 
इस चक्कर में कितने ही यार दोस्त रूठे 
और कई बार तो ऐसी नौबत भी आई 
कि अपनी ही प्रेमिका की हमने बिदाई करवाई 
आज की जनरेशन को ,
पुराने जमाने के ये तरीके,
 बड़े ओल्ड फैशन के लगते होंगे ,
पर उन दिनों ये ही चलते थे 
क्योंकि हम माँ बाप और जमाने से बहुत डरते थे 
पर हम सब ने कभी न कभी इन्हे ट्राय किया  है
और सच ,बहुत एन्जॉय किया है 
कच्ची उमर के उस अधकचरे कस्बाई इश्क़ की,
वो बाते आज भी जब याद आती है 
हमें अपनी उन बचकानी हरकतों पर ,
बहुत हंसी आती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

Friday, December 8, 2017

MY DEAR BELOVED

Dear beloved,

How are you today and your family, I am a citizen of Sudan but currently staying in Burkina Faso. My name is Miss Mariam Dim Deng,25years old originated from Sudan. I got your E-mail address/profile through my internet search from your country when I was searching for a good and trust worthy person who will be my friend and I believe that it is better we get to know each other better and trust each other because I believe any good relationship will only last if it is built on truth and real love.My father Dr. Dominic Dim Deng was the former Minister for SPLA Affair sand Special Adviser to President Salva Kiir of South Sudan for Decentralization.

My father Dr. Dominic Dim Deng and my mother including other top Military officers and top government officials had been on board when the plane crashed on Friday May 02, 2008. You can read more about the crash through the below site:http://news.bbc.co.uk/2/hi/africa/7380412.stm) After the burial of my father, my uncles conspired and sold my father's properties to a Chinese Expatriate and live nothing for me. On a faithful morning, I opened my fathers briefcase and found out the documents which he have deposited huge amount of money in one bank in Burkina Faso with my name as the next of kin. I traveled to Burkina Faso to withdraw the money so that I can start a better life and take care of myself.

On my arrival, the Branch manager of the Bank whom I met in person told me that my fathers instruction to the bank was the money is release to me only when I am married or present a trustee who will help me and invest the money overseas. I have chosen to contact you after my prayers and I believe that you will not betray my trust. But rather take me as your own sister. Though you may wonder why I am so soon revealing myself to you without knowing you, well, I will say that my mind convinced me that you are the true person to help me.

More so, I will like to disclose much to you if you can help me to relocate to your country because my uncle has threatened to assassinate me. The amount is $10.4 Million with some kilo of gold and I have confirmed from the finance security bank in Burkina Faso. You will also help me to place the money in a more profitable business venture in your Country. However, you will help by recommending a nice University in your country so that I can complete my studies.


It is my intention to compensate you with 30% of the total money for your services and the balance shall be my capital in your establishment. As soon as I receive your interest in helping me, I will put things into action immediately. In the light of the above,shall appreciate an urgent message indicating your ability and willingness to handle this transaction sincerely.
PLEASE REPLY ME TO {missmariamdimdeng_71@yahoo.com}  

Sincerely yours,
Miss Mariam Dim Deng

Thursday, December 7, 2017

गृहस्थी का संगीत 

जीवन के पल पल में साँसों की हलचल में ,
संगीत का होता वास है 
संगीत की सरगम ,सारेगम भुला देती है ,
और जीवन में  भरती मिठास है 
शादी के बाद जब ,
आपको मिल जाता है अपना मनमीत 
तो आपके जीवन में ,
गूंजने लगता है ,गृहस्थी का संगीत 
मेरी ये मान्यता है 
कि सुरो के संगीत और गृहस्थी के संगीत में ,
काफी समानता है 
ससुराल में ,पति के अलावा ,
होते दो प्राणी खास है 
और वो ,एक आपके ससुर ,
और दूसरी आपकी सास है 
देखिये ,गृहस्थी के संगीत में भी सुर आ गया 
ससुराल का मुख्य सुर,ससुर आ गया 
यदि आपके सुर मिल जाते है ,
ससुर के सुर के संग 
तो समझलो,आपने जीत ली आधी जंग 
और जहाँ तक है सास की बात 
तो यहाँ भी संगीत जैसे होते है हालात 
संगीत के स्वर 'सा रे ग  प ध नी स '
'सा 'से शुरू होकर 'स'पर होते है समाप्त 
याने' सा स 'के बीच ही सारे सुर है व्याप्त 
इसमें जेठ,जिठानी भुवा देवर और ननद 
जैसे सभी स्वर समाहित है 
और इन सबको साधने में ही आपका हित है 
 आपको इन सबके साथ सामंजस्य बिठाना होता है 
उनकी ताल पर गाना होता है 
इन सभी के साथ यदि मिलाली अपनी तान 
तो ससुराली जीवन में ,कभी नहीं होगी खींचतान 
सुर मय हो जाएगा आपका जीवन ,
 सुहाने दिन होंगे,सुरमयी शाम 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, November 24, 2017

सर्व सुलभ तू मुझे बनाना 

हे प्रभु यदि दो पुनर्जन्म और मुझे पड़े धरती पर आना 
सर्वसुलभ और बहुउपयोगी ,मिलनसार तू मुझे बनाना 
प्यार करे सब ,हर मौसम में ,रहूँ जमीन से ,जुड़ा हमेशा 
अगर बनाओ यदि जो सब्जी  ,मुझे बनाना आलू   जैसा 
बेंगन हो या मेथी,पालक ,फली मटर की ,या फिर गोभी 
रंग ना देखूं ,स्वाद बढ़ाऊं मिले साथ में ,मुझसे जो भी 
समा समोसे में मन भाऊ ,भरा रहूँ मै ,वड़ा पाव  में 
मुझे परांठे में भर कर के ,लोग नाश्ता ,करें चाव  में 
कभी चाट आलू टिक्की में ,या डोसे का बनू मसाला 
या फिर गरम पकोड़े में तल,निखरे मेरा ,स्वाद निराला 
'क्रिस्पी 'कभी बनू 'वेफर'सा ,या फिर 'फ्रेंच फ़्राय'सा प्यारा 
हे भगवान ,बनाना मुझको ,आलू जैसा सर्व दुलारा 
या फिर जनजन का मन प्रिय बन शक्ति का मै बनू खजाना 
प्रभु जो मुझको अन्न बनाओ तो मुझको तुम चना बनाना 
ताकत मिले ,भिगो खाने में ,खाओ भून कर ,भूख मिटाओ 
छोले चांवल ,चना भठूरे ,लेकर स्वाद,,प्रेम से खाओ 
दाल बना ,खाओ रोटी संग ,या तल कर नमकीन बनाओ 
और पीसो तो ,बेसन बन कर ,कई ढंग से स्वाद बढ़ाओ 
कभी पकोड़ी जैसा तल लो ,कभी भुजिया ,सेव बनालो 
कभी बना ,बेसन के लड्डू या बूंदी परशाद  चढ़ा लो 
बेसन की प्यारी सी बरफी ,या फिर मोतीचूर  सुहाना 
या हल्दी और तैल मिलाकर ,उबटन बना ,रूप निखराना 
मीठा या नमकीन सभी कुछ ,बनकर सबका मन ललचाना 
सर्वसुलभ और बहु उपयोगी ,हे भगवन ,तू मुझे बनाना 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, November 21, 2017

पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 

राजवश का कोई राजा ,पब्लिक का सर्वन्ट हो गया  
कल तक था जो मिटटी गारा ,आज वही सीमेन्ट हो गया  
सत्ता सिमट रही अपनों में,देखो कैसा ट्रेन्ड हो गया 
पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 
जबसे मंदिर मंदिर जाकर ,उसने अपना शीश झुकाया 
जबसे उसने अपने मस्तक पर चन्दन का तिलक लगाया 
तबसे कम बकवास कर रहा ,वो थोड़ा डिसेन्ट  हो गया 
पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 
उसकी जयजयकार कर रहा ,है उसके चमचों का जत्था 
मम्मी  खुश है , यही तसल्ली, पास रही  पुश्तैनी  सत्ता 
अब तक उसका राज टेम्पररी था अब परमानेन्ट हो गया 
पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 
राजनीति में ,कुर्सी की हसरत ,क्या क्या करवा देती है 
पिज़ा ,पास्ता खाने वाले को, खिचड़ी  खिलवा देती है 
एक पुदीने का पत्ता था, अब वो पिपरमेंट  हो गया 
पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 
प्रौढ़ खून में आयी जवानी ,अब कोतवाल बन गए सैया 
नाव डुबोने वाला मांझी ,ही अब देखो बना खिवैया 
अध्यादेश फाड़ने वाला ,कितना ओबीडियन्ट हो गया 
पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 
बांह चढाने का अफलातूनी अंदाज बदल जाएगा 
आज चढ़ा है कुर्सी पर तो कल घोड़ी भी चढ़ जाएगा 
हाथ मिला ,सेल्फी खिचवाता ,अब वो सबका फ्रेन्ड हो गया 
पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 
अब जितने बेरोजगार है ,सबको जॉब दिला देगा वो 
जितना करजा है किसान पर ,सबको माफ़ करा देगा वो 
वादे कर सबको भरमाना ,राजनीति का ट्रेंड हो गया 
पप्पू प्रेसिडेंट हो गया 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Monday, November 13, 2017

अच्छा लगे कहाना अंकल 

हुए रिटायर ,बाल न सर पर ,दुःख मन में हर पल रहता है 
इसीलिये  अच्छा लगता जब ,कोई मुझे अंकल  कहता है 
अंकल के इस  सम्बोधन  में ,बोध  बड़प्पन का होता है ,
क्योंकि इसमें सखा भाव  संग ,श्रद्धा भाव  छुपा  रहता  है 
कल की सोच सोच कर अक्सर ,ये मन बेकल सा हो जाता,
अंकल के कल में यादों का ,सरिता जल, कल कल बहता है 
कभी जवानी जोर मारती ,कभी  बुढ़ापा  टांग  खींचता ,
प्रौढ़ावस्था  में  जीवन की  ,चलता  ये दंगल  रहता  है 
भाई साहब कहे जाने से ,अच्छा है अंकल कहलाना ,
और बूढा कहलाने से तो  ,निश्चित  यह  बेहतर  रहता है 
दिन दिन है हम बढे हो रहे,उमर हुई दादा ,नाना की,
चन्द्रबदनी  बाबा ना कहती,मन में यह संबल रहता है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Monday, November 6, 2017


Conversation opened. 1 read message.

Skip to content
Using Gmail with screen readers
7
Search


in:sent 

Gmail
COMPOSE
Labels
Inbox (581)
Starred
Important
Sent Mail
Drafts (31)
[Imap]/Sent
[Imap]/Trash
abc
baheti sir
BIRTHDAY
favourite
kavita
More 
 
 
Move to Inbox More 
10 of 2,459  
 
Print all In new window
(no subject)

madan mohan Baheti <baheti.mm@gmail.com>
Nov 1 (5 days ago)

to baheti.mm.t., baheti.mm.tara2, baheti.mm.tara4 
मैं गधे का गधा ही रहा 

मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
         गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 
मै तो दीपक सा बस टिमटिमाता रहा ,
        तुम शीतल,चटक चांदनी बन गयी 
मैं तो कड़वा,हठीला रहा नीम ही,
     जिसकी पत्ती ,निबोली में कड़वास है 
पेड़ चन्दन का तुम बन गयी हो प्रिये ,
  जिसके कण कण में खुशबू है उच्छवास है 
मैं तो पायल सा खाता रहा ठोकरें ,
    तुम कमर से लिपट ,करघनी बन गयी 
मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा ,
       गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 
मैं था गहरा कुवा,प्यास जिसको लगी ,
     खींच कर मुश्किलों से था पानी पिया 
तुम नदी सी बही ,नित निखरती गयी ,
     पाट चौड़ा हुआ ,सुख सभी को दिया 
मैं तो कांव कांव, कौवे सा करता रहा ,
            तुमने मोती चुगे ,हंसिनी हो गयी    
मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
        गाय थी तुम प्रिये, शेरनी बन गयी 
मैं तो रोता रहा,बोझा ढोता रहा ,
         बाल सर के उड़े, मैंने उफ़ ना करी 
तुम उड़ाती रही,सारी 'इनकम' मेरी,
        और उड़ती रही,सज संवर,बन परी   
मैं फटे बांस सा ,बेसुरा  ही रहा,
          बांसुरी तुम मधुर रागिनी बन गयी
मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा,
          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी  
फ्यूज ऐसा अकल का उड़ाया मेरी ,
           सदा मुझको कन्फ्यूज करती रही 
मैं कठपुतली बन  नाचता ही रहा ,
          मनमुताबिक मुझे यूज करती रही
मैं तो कुढ़ता रहा और सिकुड़ता रहा ,
          तुम फूली,फली,हस्थिनी  बन गयी 
मैं गधा था गधे का गधा ही रहा ,
          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी   
ऐसा टॉफी का चस्का लगाया मुझे,
        चाह में जिसकी ,मैं हो गया बावला 
अपना जादू चला ,तुमने ऐसा छला ,
           उम्र भर नाचता मैं रहा मनचला 
मैं तो भेली का गुड़ था,रहा चिपचिपा,
         रसभरी तुम ,मधुर चाशनी हो गयी 
मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी हो गयी 
जाल में जुल्फ के ,ऐसे उलझे नयन ,
        मैं उलझता,उलझता उलझता गया 
ऐसा बाँधा मुझे,रूप के जाल में ,
        होके खुश बावरा ,मैं तो फंसता  गया 
उबली सी सब्जी सा ,मैं तो फीका रहा ,
          और प्रिये दाल तुम,माखनी बन गयी 
मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा ,
             गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 
         
मदन मोहन बाहेती'घोटू'


भाव नहीं देती है 

ऐसा है स्वभाव ,करती सबसे है मोलभाव ,
सब्जी हो या साड़ी सब ,सस्ती लेकर आती है 
मन में है उसके न दुराव न छुपाव कहीं,
सज के संवर  ,हाव भाव  दिखलाती  है 
रीझा पति पास जाय ,भाव नहीं देती है ,
मन में लगाव पर बहुत भाव खाती है  
रूप के गरूर में सरूर इतना आ जाता ,
पिया के जिया के भाव ,समझ नहीं पाती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नींद क्यों नहीं आती 

कभी चिंता पढाई की ,थी जो नींदें उड़ाती थी 
फंसे जब प्यार चक्कर में ,हमे ना नींद आती थी 
हुई शादी तो बीबीजी,हमें  अक्सर  जगाती थी 
करा बिजनेस तो चिंतायें ,हमे रातों सताती थी 
फ़िक्र बच्चो की शादी की,कभी परिवार का झंझट 
रात भर सो न पाते बस ,बदलते रहते हम करवट 
किन्तु अब इस बुढ़ापे में,नहीं जब कोई चिंतायें 
मगर फिर भी ,न जाने क्यों ,मुई ये नींद न आये 
न लेना कुछ भी ऊधो से ,न देना कुछ भी माधो का 
ठीक से सो नहीं पाते ,चैन गायब है रातों का 
जरा सी होती है आहट ,उचट ये नींद जाती है 
बदलते रहते हम करवट,बड़ा हमको सताती है 
एक दिन मिल गयी निंदिया ,तो हमने पूछा उससे यों 
बुढ़ापे में ,हमारे साथ,करती बदसलूकी क्यों 
लाख कोशिश हम करते ,बुलाते ,तुम न आती हो 
बड़ी हो बेरहम ,संगदिल,मेरे दिल को दुखाती हो
कहा ये निंदिया ने हंस कर,जवां थे तुम ,मैं आती थी 
भगा देते थे तुम मुझको,मैं यूं ही लौट जाती थी 
नहीं तब मेरी जरूरत थी ,तो था व्यवहार भी बदला 
है अब जरूरत ,मैं ना आकर ,ले रही तुमसे हूँ बदला 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

 
अब तो खिचड़ी खानेवाली उमर आ गयी 

आलस तन में बसा ,रहे ना अब फुर्तीले 
खाना वर्जित हुए ,सभी पकवान रसीले 
मीठा खाना मना,तले पर पाबंदी  है 
भूख न लगती,पाचनशक्ति भी मंदी है
खा दवाई की रोज गोलियां ,हम जीते है 
चाट पकोड़ी मना ,चाय फीकी पीते है 
दांत गिर गए ,चबा ठीक से ना पाते हम 
पुच्ची भर में बदल गया हो जैसे चुंबन 
यूं ही मन समझाने वाली उमर आ गयी 
अब तो खिचड़ी खानेवाली उमर आ गयी 
'आर्थराइटिस 'है घुटनो में रहती जकड़न 
थोड़ी सी मेहनत से बढ़ती दिल की धड़कन 
'डाइबिटीज 'के मारे सब अंग खफा हो गए 
मिलन और अवगुंठन के दिन ,दफा हो गए 
वो उस करवट हम इस करवट ,सो लेते है 
आई लव यू आई लव यू ,कह खुश हो लेते है 
कभी यहां पीड़ा है ,कभी वहां दुखता है 
फिर भी दिल का दीवानापन ,कब रुकता है 
अब तो बस ,सहलानेवाली  ,उमर आ गयी 
अब तो खिचड़ी खानेवाली ,उमर  आगयी 
 कहने,सुनने की क्षमता भी क्षीण हो चली 
अंत साफ़ दिखता पर आँखें धुंधली धुंधली 
छूटी मौज मस्तियाँ ,मोह माया ना छूटी 
देते रहते खुद को यूं ही तसल्ली ,झूठी 
कोसों दूर बुढ़ापा ,हम अब भी जवान है 
मन ही मन ,अंदर से रहते परेशान है 
बात बात पर अब हमको गुस्सा आता है 
बीती यादों में मन अक्सर खो जाता है 
यूं ही मन बहलानेवाली उमर आ गयी 
अब तो खिचड़ी खानेवाली ,उमर आ गयी 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 
दिल मगर दिल ही तो है 

हरएक सीने में धड़कता ,है छुपा बैठा कहीं,
चाह पूरी जब न होती,मसोसना भी पड़ता है 
कभी अनजाने ही जब ,जुड़ जाता ये है किसी से,
नहीं चाहते हुए उसको ,तोडना भी पड़ता  है 
कभी चोंट खाकर जब ,पीता है वो खूं के आंसू,
उसकी मासूमियत को ,कोसना भी पड़ता है 
कभी देख कर किसी को,जब मचल जाता है,
तो किसी के साथ उसको ,जोड़ना भी पड़ता है 
बात दिल की है ,कोई दिलदार कोई दिलपसंद,
तो कोई है दिलरुबाँ ,दिलचस्प है और दिलनशीं 
कोई दिलवर है कोई दिलसाज कोई दिलफरेब ,
दिल दीवाने को सुहाती है किसी की दिलकशी 
कोई होता संगदिल तो कोई होता दरियादिल ,
जब किसी पे आता तो देता ये मुश्किल ही तो है 
इसकी आशिक़ मिजाजी का ओर है ना छोर है,
कुछ भी हो,कैसा भी हो,ये दिल मगर दिल ही तो है 


मदन मोहन बाहेती'घोटू'