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Sunday, March 17, 2019

कोई डॉक्टर  बताये - मुझे क्या हुआ है?

घनीभूत कुछ तरल ,नासिका  छिद्रों में है जमा हुआ
हुआ मार्ग अवरुद्ध ,श्वास का गमन,आगम थमा हुआ
कंठ मार्ग भी वाधित है ,कुछ भी गटको तो करे पीर
शिथिल हुआ तन,आलस छाया ,है परेशान ,ये मन अधीर
जलन चक्षुओं में होती है,मस्तक थोडा भारी है
उष्मित है तन,सुनो चिकित्सक,मुझको कौन बिमारी है
है उपचार कौनसा इस ,व्याधि का मुझको बतलाओ 
शीध्र स्वस्थ हो  जाऊं मै भेषज कुछ ऐसी दिलवाओ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
बुरा न मानो होली है 
            दो छक्के-उनके लिए 
                   १
जब भी है हम देखते,चेहरा कोई हसीन 
लगता है लावण्यमय ,सुन्दर और नमकीन
सुन्दर और नमकीन,पास जा प्यार जताते
मिलता मीठा स्वाद और मीठी सी  बातें
कह घोटू कविराय समझ में ये ना आता
लज्जत भरी मिठास,हुस्न नमकीन कहाता
                           २
पत्नी हथिनी की तरह, पति तिनके से क्षीण
अब ये तुम्ही समझ लो ,किसके ,कौन अधीन
किसके कौन अधीन ,अगर पत्नी हो पतली
और मोटे पतिदेव ,मगर हालत है पतली
खरबूजे पर छुरी गिरे ,छुरी पर खरबूजा
पर कटता हर बार ,बिचारा पति ,खरबूजा

           कूकर या कुकर
                      १
पत्नी बोली पति और कूकर एक सुभाय
दोनो ही है पालतू, स्वामी भक्त  कहलाय 
स्वामिभक्त कहलाय ,सिर्फ इतना है अंतर
कुत्ता   भोंके रात,हिलाये पूंछ दिवस भर
'घोटू 'पर पति दिन भर भौंके ,रॉब दिखाता
और रात को पत्नी आगे  पूंछ  हिलाता
                       २
हम बोले पति श्वान ना ,होता घर की शान
घर की रखवाली करे ,रखता सबका ध्यान
रखता सबका ध्यान ,कुकर प्रेशर के जैसा 
जब भी बढे दबाब ,बजाता सीटी ,हमेशा
जो घंटों का काम मिनिट भर में निपटाता
वो कूकर ना ,वो तो प्रेशर कुकर कहाता
घोटू
मेरे  सभी प्रिय मित्रो  !
अब आप हथिनी कहें या पत्नी ,छुरी कहे या खरबूजा ,
कूकर कहे या कुकर ,पति तो बेचारा पति ही है  -अगर 
पत्नी से  पटी ,तो जीवन कि हर चीज चटपटी और 
अगर आपस में ना पटी ,तो रोज की ऊठा पटी ,
तो झटपट अब उठक  पटक को छोड़ कर  पत्नी के  
प्यार के रंगों में सरोबार हो जाइये और होली के मजे 
उठाइये -आप सब को गुलाल भरी शुभकामनाये
 आपका परम प्रेमी 
मदन मोहन बाहेती'घोटू '
    a

Sunday, March 10, 2019

अलग उनको कर  दिया

घर के बर्तन चमचमाते ,आये कितने काम में ,

         मोच खा ,जब थे पुराने ,अलग उनको कर   दिया

जब तलक मतलब था हमसे ,काम वो  लेते रहे ,

         और  फिर कोई बहाने ,अलग   हमको  कर दिया

हम ने उनके   गुलाबी रुखसार को सहला दिया ,

          लगी वो नखरे दिखाने ,अलग हमको  कर दिया

होली के दिन पहनने में काम ये आ जायेंगे ,

           हुये जब कपडे पुराने ,अलग उनको कर दिया

बोखे मुंह से ,हमने चुम्बन ,अपनी बुढ़िया का लिया ,

        दांत नकली ना   चुभाने ,अलग  उनको कर  दिया

 छेद थे बनियान में,पर रखा सीने से लगा ,

           फटा कुरता ,ना दिखाने ,अलग उसको कर दिया

जिनको उनने , पाला पोसा  ,पेट अपना काट कर ,

            लगे जब खाने कमाने ,अलग उनको कर दिया

पाँव छूने और छुलाने की गए बन चीज वो ,

             हुए जब माँ बाप बूढ़े ,अलग उनको  कर  दिया

ये जमाने का चलन है ,क्यों दुखी होते हो तुम ,

              हुए तुम फेशन पुराने ,अलग तुमको कर दिया

               

 मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, March 8, 2019

वो पुराना जमाना 


आज जब जीवन,

 बड़ी तेजी से बदलता जा रहा है 

हमें रह रह कर ,

वो पुराना जमाना याद आ रहा है 

तब जब न सर्फ़ था ,न एरियल था ,न टाइड था 

बस सिर्फ  एक साबुन सनलाइट  था ,

जिससे  घर भर के सारे कपडे धुला करते थे 

और कुछ लोग उससे नहा भी लिया करते थे 

वैसे नहाने के लिए ,लाइफबॉय की लाल बट्टी 

आया करती थी काम 

या फिर कुछ लोग काम में लेते थे जय और हमाम 

वैसे उन दिनों  लक्स साबुन भी पॉपुलर था ,

जिसे विज्ञापन सिने तारिकाओं के सौंदर्य का 

रहस्य बतलाते थे 

भले ही उससे डेविड,शेट्टी और ओमपूरी भी नहाते थे 

बचे हुए साबुन की चीपटों से ,

शौच के बाद हाथ साफ़ किये जाते थे 

वैसे इस काम के लिए ,मिट्टी और राख  ,

काम में लिए जाते थे 

औरते,काली मिटटी और दही मिला कर ,

सर के बालों को धोने के लिए काम में लाती थी 

और मेकअप के लिए अफगान स्नो लगाती थी 

न तरह तरह के शेम्पू होते थे ,न कंडीशनर थे 

सिर्फ ब्राह्मी आंवला तेल ,लगाते सर पर थे 

न परफ्यूम थी या सेंट या डियो थे 

लोग कान में रखते इत्र के फुहे थे 

उन दिनों कूलर और ए सी नहीं होते थे 

रात को लोग ,खुली छतों पर सोते थे 

गर्मी में हाथ से पंखा डुलाते थे 

और गर्मी से निजात पाते थे

 मटके और सुराही का पानी पीते थे 

और खुश होकर जीवन जीते थे 

न कोकोकोला था ,न पेप्सी थी ,

न थम्सअप का जोश था 

फिर भी सबके मन में संतोष था 

थोड़ी सी पगार और बहुत बड़ा परिवार 

फिर भी ख़ुशी ख़ुशी लेते थे जीवन गुजार 

छोटा भाई,बड़े भाई के छोटे हुए कपडे पहनता था 

टीवी के सीरियल नहीं थे ,

दादी,नानी की कहानियों से मन बहलता था 

रोज दाल रोटी खाते थे ,

बस कभी कभी ही पकवान छनते  थे 

त्योंहारों पर ही ,

पूरी और पूवे बनते थे  

पिज़्ज़ा,पास्ता या बर्गर 

या फिर दो मिनिट में बनने वाले नूडल 

लोग इन सबके नाम से भी अनजान थे 

सीधीसादी  जिंदगी थी,भोले भाले  इंसान थे 

पर जबसे इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने डेरा डाला है 

नई नई ब्रांडों के चक्कर ने ,

सारा बजट ही बिगाड़ डाला है 

हर काम के लिए ,अलग अलग प्रोडक्ट ,

और अलग अलग ब्रांड आ गए है 

विज्ञापन के बल पर लोगों के ,

दिलो दिमाग पर छा गए है 

ब्रांडेड चीजों का उपयोग ,

एक स्टेटस सिम्बल बन गया है 

सब लोग खोजते है,क्या नया है 

इसी चक्कर में चीजों  के दाम,

 आसमान पर चढ़ गए है 

 खरचे  बेहताशा बढ़ गए है 

 मंहगी वस्तुए ,लोगो की पसंद हो  गयी है 

और जबसे ये माल खुल गए है,

छोटी दुकाने बंद हो गयी है 

चार आने वाली चाट ,बड़े बड़े रेस्टारेंट में 

चालीस रूपये की मिलती है 

और फिर भी खरीदने के लिए

 लोगों की लाइन लगती है 

देखिये ,कैसे दिन आ रहे है 

लोग जेब कटवा कर भी मुस्करा रहे है 

जीवनशैली का ये परिवर्तन ,

हमे कहाँ से कहाँ ले जा रहा है 

मुझे आज फिर वो पुराना जमाना याद आरहा है 


मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, March 1, 2019

चंद  चतुष्पदियाँ  

१ 
हंसना सिखाया ,मस्तियाँ और मौज भेज दी 
ग़म रोके ,ढेर सारी खुशियां ,रोज भेज दी 
मांगे थे मैंने तुझसे बस दो तीन  खैरख्वाह ,
तूने तो खुदा ,दोस्तों की फ़ौज भेज दी 
२ ,
प्राचीन इमारतों की भी तो शान बहुत है 
बुझते हुए दीयों पर भी मुस्कान बहुत है 
जीने का ये अंदाज कोई सीख ले हमसे ,
महफ़िल ये बुजुर्गों की ,पर जवान बहुत है 
३ 
बढ़ती हुई उमर के भी अब अंदाज अलग है 
बूढ़े हुए है ,दिल में पर जज्बात अलग है 
लेते है मौज मस्तियाँ ,आशिक़ मिजाज है ,
बोनस में जी रहे है हम ये बात अलग है 
४ 
वीरान जिंदगी को वो कर खुशनुमा गये 
धड़कन के साथ ,जगह वो दिल में बना गये 
पहली नज़र में प्यार का जादू चला गए ,
आँखों के रस्ते आये और दिल में समा गए 
५ 
देखूं जो उसे ,मन में एक तूफ़ान जगे है 
मुस्कान मेरी अब भी मेरे मन को ठगे है 
चांदी से बाल ,सोने सा दिल ,हुस्न गजब का ,
 बुढ़िया  नहीं,बीबी मेरी ,जवान लगे है  
६ 
मोहब्बत तोड़ कर देखो ,मोहब्बत जान पाओगे 
मोहब्बत का सही मतलब ,तभी पहचान पाओगे 
शुरू में मोह होता है , साथ में रहते रहते पर ,
इबादत में ,इक दूजे की ,बदलता इसको पाओगे 

घोटू  ,


घोटू 

Wednesday, February 27, 2019

अनिल ममता मिलान -शादी के बाद 
१ 
शादी कर जीवन हुआ ,दोनों का खुशहाल  
एक दूजे का प्रेम से ,रखते थे वो ख्याल 
रखते थे वो ख्याल ,खिली जीवन की बगिया 
रितिका और राधिका ,महकी दो दो कालिया 
गुणी  और होशियार ,मगर 'मूडी 'मनभाती 
मम्मी और पापा दोनों को नाच नचाती 

२ 
दिल्ली आये ,काम में ,दोनों ही हो व्यस्त 
थक जाते थे शाम तक ,हो जाते थे पस्त 
हो जाते थे पस्त ,यही होता था   अक्सर 
ममता हॉस्पिटल में रहता अनिल टूर पर 
कह घोटू कविराय इस तरह चली गृहस्थी 
फिर भी खुश थे ,प्यार भरी थी इनकी मस्ती 

घोटू 

Monday, February 25, 2019

पिरामिड और इंसान 

कहते है कि ऊँट जब पहाड़ के नीचे आता है 
तब ही वो अपनी औकात समझ  पाता है 
वैसी ही भावनाएं मेरे मन में हुई जाग्रत 
जब मैं मिश्र देश के पिरेमिड के पास खड़ा हुआ ,
मेरा अहम् हुआ आहत 
मैंने देखा कि इस विशाल ,भव्य संरचना के आगे ,
इंसान कितना अदना है 
फिर सोचा कि ये पिरेमिड भी तो ,
इंसान के हाथों से ही बना है 
इंसान का कद कितना ही छोटा क्यों न हो ,
यह उसके बुलंद हौसले और सोच का ही कमाल है
जिसने बनाया ये पिरेमिड बेमिसाल है 
जिसका एक एक पत्थर इंसान के आकार के बड़ा है 
और जो हजारों वर्षों से ,हर मौसम को झेलता हुआ ,
आज भी सर उठाये गर्व से खड़ा है 
दर असल ये विशाल पिरेमिड ,अदने से मानव के ,
मस्तिष्क की सोच की  महानता के सूचक है 
जिसके बल पर  वो पहुँच गया चाँद तक है 
आदमी का आकार  नहीं ,
ये उसकी सोच और जज्बे का बलबूता है 
जिससे वह कामयाबी की ऊँची मंजिलों को छूता है


मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
 

Sunday, February 24, 2019

अनिल ममता की प्रेमकहानी 
१ 
एक मामा की  भानजी ,एक मासी का लाल 
दोनों के नयना लड़े , ऐसा हुआ  कमाल 
ऐसा हुआ कमाल ,मिले आशीष शादी में 
हुई एक मीठी हलचल ,दोनों  के जी  में 
सुना अनिल का गान ,हुई ममता दीवानी 
शुरू हो गयी,इन दोनों की प्रेम कहानी 
२ 
प्रथम नज़र में जग गए ,दोनों के जज्बात 
घंटों टेलीफोन पर , शुरू हो गयी  बात 
शुरू हो गयी बात ,चौगुना बिल जब आया
देखा तो ,जाजूजी का, माथा  ठनकाया  
समझे अनिल प्यार की खिचड़ी लगा पकाने 
और इधर ममता मम्मी को लगी मनाने 
३ 
चिंगारी ने प्रेम की ,लिया रूप विकराल 
प्रेम अगन जलने लगे ,देखा जब ये हाल 
देखा जब ये हाल, हुए  राज़ी  घरवाले 
तीन मार्च को उनके फेरे करवा डाले 
होगए पच्चीस साल,जुडी जब इनकी जोड़ी 
 घोटू बस इतनी सी इनकी लव स्टोरी 

घोटू 
   

Thursday, February 21, 2019

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Thursday, February 14, 2019

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Wednesday, February 13, 2019

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Tuesday, February 12, 2019

USPS Delivery Attempt Fail Notice





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सुख दुःख 

मैंने हर मौसम की पीड़ा भुगती तो ,
हर मौसम का सुख भी बहुत उठाया है 
मैंने तुम पर जितना प्यार लुटाया है ,
उससे ज्यादा प्यार तुम्हारा पाया है 

इस जीवन के कर्मक्षेत्र में जीत कभी ,
तो फिर कभी हार का मुख भी देखा है 
अगर कभी जो दुःख के आंसू टपकाये ,
आल्हादित होने का सुख भी देखा है 
ख़ुशी ख़ुशी जब पीड़ प्रसव की झेली है ,
तब ही मातृत्व का आनन्द उठाया है ,
मैंने तुम पर जितना प्यार लुटाया है ,
उससे ज्यादा प्यार तुम्हारा पाया है 

वो सूरज की तेज तपन ही है जिससे ,
मेघ जनम ले ,शीतल जल बरसाते है 
पाते हम परिणाम हमारे कर्मो का 
जससे जीवन में सुख दुःख आते जाते है 
विरह पीर में रात रात भर तड़फा हूँ ,
तभी मिलन के सुख से मन मुस्काया है 
मैंने तुम पर जितना प्यार लुटाया है ,
उससे ज्यादा प्यार तुम्हारा पाया है 

दो घूट पियो मदिरा के तो मस्ती मिलती ,
ज्यादाअगर पियो बीमार बना देती 
 सर्दी ,गर्मी बारिश अच्छे मौसम पर ,
उनकी अति ,जीना दुश्वार बना देती 
वैसे ही सुख दुःख का संगम ,जीवन है ,
आज ढला,तब कल सूरज उग पाया है 
मैंने तुम पर जितना प्यार लुटाया है ,
उससे ज्यादा प्यार तुम्हारा पाया है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
रात के तूफ़ान के बाद 

थोड़ी सी शरारत मैंने की ,थोड़ी सी शरारत तुमने की ,
पर ये सच है कि शरारतें ,दोनों की प्यारी प्यारी थी 
इस सर्द ठिठुरते मौसम में ,तन मन में आग लगा डाली ,
हम दोनों को ही जला गयी ,ऐसी भड़की चिंगारी थी 
दो घूँट प्यार के मैंने पिये ,दो घूँट प्यार के तुमने पिये ,
हम मतवाले मदहोश हुये ,कुछ ऐसी  चढ़ी खुमारी थी 
अब जब तूफ़ान थम गया है ,मुझको इतना तो बतला दो ,
ये पहल करी थी मैंने या इसमें फिर पहल तुम्हारी थी  

घोटू 

Sunday, February 10, 2019

सरस्वती वंदना
 
वीणापाणि तुम्हारी वीणा मुझको स्वर दे 
नवजीवन उत्साह नया माँ मुझमे भर  दे 
पथ सुनसान,भटकता सा राही हूँ  मैं ,
ज्योति तुम्हारी ,निर्गमपथ ज्योतिर्मय कर दे 

घोटू 

Friday, February 8, 2019

 पैसे की दास्तान    

कल  बज रहा था एक गाना 
बहुत पुराना 
ओ जाने वाले बाबू ,एक पैसा दे दे 
तेरी जेब रहे ना खाली 
तेरी रोज मने दीवाली 
तू  हरदम मौज उड़ाए
कभी न दुःख पाए -एक पैसा दे दे 
एक पैसे का नाम सुन 
मेरी आँखों के आगे लौट आया बचपन 
जब था एक पैसे के मोटे से सिक्के का चलन
माँ  के पैर दबाने पर
या दादी की पीठ खुजाने पर 
हमें कई बार पारितोषिक के रूप में मिलता था ,
उगते सूरज की ताम्र आभा लिए 
एक पैसे का सिक्का ,
जब हाथ में आता था 
बड़ा मन भाता था 
हमें अमीर बना देता था 
ककड़ी वाला लम्बा गुब्बारा दिला देता था 
या नारंगी वाली मीठी गोली खिला देता था 
हमारे बड़े ठाठ हो जाते थे 
हम कभी आग लगा हुआ चूरन ,
या कभी चने की चाट खाते थे 
बचपन का वह बड़ा हसीन दौर होता था 
खुद खरीद कर खाने का ,
मजा ही कुछ और होता था 
वो एक पैसे का ताम्बे का सिक्का ,
हमें थोड़ी देर के लिए रईस बना देता था 
और उस दिन उत्सव मना देता था 
जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया ,
पैसा छोटा होता गया 
और एक दिन किसी ने उसकी आत्मा ही छीन ली 
उसका दिल कहीं खो गया 
और वो एक छेद वाला पैसा हो गया   
जैसे जैसे उसकी क्रयशक्ति क्षीण होती गयी 
उसकी काया जीर्ण होती गयी 
और एक दिन वो इतना घट गया 
कि  माँ की बिंदिया जितना ,
एक नया पैसा बन कर सिमट गया 
पता नहीं जेब के किस कोने में खिसक जाता था 
गिर भी जाता तो नज़र नहीं आता था 
न उसमे खनक थी ,न रौनक थी,
और उसकी क्रयशक्ति भी हो गया था खात्मा  
ऐसा लगता था की बीते दिनों की याद कर ,
आंसू बहाती हुई है कोई दुखी आत्मा  
उसके भाई बहन भी आये जो 
दो,पांच और दस पैसे के चमकीले सिक्के थे 
पर मंहगाई की हवा में सब उड़ गए ,
क्योंकि वो बड़े हलके थे 
फिर चवन्नी गयी ,अठन्नी गयी ,
रूपये का सिक्का नाम मात्र को अस्तित्व में है ,
पर गरीब दुखी और कंगाल  है
अगर जमीन पर पड़ा भी मिल जाए 
तो लोग झुक कर उठाने की मेहनत नहीं करते ,
इतना बदहाल है 
अब तो भिखारी भी उसे लेने से मना कर देता है ,
उसे पांच या दस रूपये चाहिये 
बस एक भगवान के मंदिर में कोई छोटा बड़ा नहीं होता 
आप जो जी में आये वो चढ़ाइये
पैसे की हालत ये हो गयी है कि 
उसका अस्तित्व लोप हो गया है ,बस नाम ही कायम है 
कई बार यह सोच कर होता बड़ा गम है 
लोग कितने ही अमीर लखपति करोड़पति बन ,
पैसेवाले तो कहलायेंगे 
पर आप अगर उनके घर जाएंगे
तो शायद ही एक पैसे का कोई सिक्का पाएंगे 
उनके बच्चों ने कदाचित ही ,एक पैसे के
 ताम्बे के सिक्के की देखी  होगी शकल  
क्योंकि अपने पुरखों को कौन पूजता है आजकल
बस उनका 'सरनेम 'अपने नाम के साथ लगाते है 
वैसे ही लोग पैसा तो नहीं रखते ,
पर पैसेवाले कहलाते है 
वाह रे पैसे 
तूने भी बुजुर्गों की तरह ,
दिन देख लिए है कैसे कैसे 

मदन मोहन बाहेती ' घोटू '
 
      अरुण ज्योति मिलन उत्सव 
             पचासवीं वर्षगाँठ 
                   १  
दिवस आज का ख़ास है ,मन में है उल्लास  
अरुण ज्योति के मिलन को,बीते बरस पचास 
बीते बरस पचास ,सुखी रह कर मुस्काये 
 जीवन बगिया महकाई ,दो पुष्प  खिलाये 
प्यारी बेटी सोनू ,सोहना पुत्तर  आश्विन 
हंसी ख़ुशी बीते इनके जीवन का हर दिन 
                     २ 
बम्बई की कच्ची कली ,उज्जैन का मासूम 
दोनों ने मिल मचाई ,देखो कैसी  धूम  
देखो कैसी धूम ,सुखी परिवार बसाया 
मिली अरुण को ज्योति ,पूरा घर चमकाया 
कह घोटू कविराय बन गए अब भोपाली 
घूम फिर कर के मौज मनाते,शान निराली 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '